आज यह प्रश्न बड़ा ही जटिल बना हुआ है कि भोजन ग्रास को कितनी बार चबाकर खाना चाहिये ? पाश्चात्य डाक्टरों की प्रायः सम्मति है और उनके अन्ध विश्वासी पाश्चात्य-शिक्षा-दीक्षित भारतीय भी यह कहा करते हैं कि कम से कम बत्तीस बार ग्रास को खूब चबाकर खाना चाहिये। परन्तु अन्धेरे में चांदमारी करने वाले इन महाशयों से यदि पूछा जाए, कि यदि खीर मोहन भोग किंवा मक्खन खाना हो तो वह चबाने की तो वस्तु नहीं है, क्या उसे भी बत्तीस बार चबाना चाहिये ? या उसे बैरङ्ग कार्ड लिफाफे की भांति तत्काल लेटर बक्स में डाल लेना चाहिये ? अथवा और कुछ उछल कूद मचानी चाहिये ? इसलिये ३२ बार चबाने या खूब चबाने की वे लोग कोई ऐसी कसौटी नहीं बतला सकते जिससे कि 'खूब' का पता चल सके, या ३२ का समन्वय बैठ सके। आज मानवसमाज वेदोक्त प्राकृतिक नियमों से कितनी दूर चला गया है—यह बात हमारी नीचे लिखी पंक्तियों से भली प्रकार समझ में आ सकेगी।

भगवान् ने मानवपिंड में मूत्रेन्द्रिय और जिह्वा में रसानुभूति की सर्वाधिक योग्यता स्थिर की है, इसीलिये लोग प्रायः शिश्नोदरपरायण बने हुए हैं, परन्तु वस्तुतः भोजन और मैथुन के बाद जो ग्लानि अनुभव होती है—उसकी विद्यमानता में (यदि उक्त दोनों इन्द्रियों में यह रसास्वादन की योग्यता न होती तो) कोई भी मनुष्य पुनः भक्षण और मैथुन में प्रवृत्त न होता और इस तरह संसार का प्रवाह ही परिसमाप्त हो जाता ! परन्तु भगवान् को संसार की सत्ता अभीष्ट है, इसलिए जिह्वालौल्य और शिश्नसुख स्पर्श के लालच से ही मनुष्य इस असुखोदर्क महंगे सौदे को खरीदने में पुनः पुनः प्रवृत्त होता है। यहां कामशास्त्र का प्रसङ्ग नहीं है, अतः शिश्नरस की शास्त्रीय विवेचना-यदि ग्रन्थ के कलेवर ने आज्ञा दी तो यथास्थान अन्यत्र की जाएगी। परन्तु भोजन प्रसङ्ग में जिह्वा की इतिकर्तव्यता का विश्लेषण करना परमावश्यक है। पाठक यह न भूले होंगे कि हम यहां इस प्रश्न का प्राकृतिक उत्तर देने चले हैं कि 'भोजन ग्रास कितनी बार चबा-चबाकर खाना चाहिए ?

सनातनधर्म का सीधा उत्तर है कि प्रत्येक भक्ष्य भोज्य लेह्य और चोष्य पदार्थ को तब तक कण्ठ के नीचे नहीं उतरने देने चाहिए, जब तक कि उसमें रस विद्यमान रहे। पाठक यह अटपटा उत्तर सुनकर चौंकें नहीं, किन्तु जरा धैर्यपूर्वक पूरी बात सुनें। शास्त्र में लिखा है कि—

जाठरो भगवान्नग्निरीश्वरोऽन्नस्य पाचकः।
सौक्ष्म्याद्रसानादानो विवेक्तुं नैव शक्यते॥
(बृहन्निघण्टुरत्नाकर ५)

अर्थात्—जाठराग्नि रूप भगवान् साक्षात् ईश्वर है जो खाए हुए अन्न को पकाता है। वह रस को ग्रहण करता हुआ भी सूक्ष्म होने के कारण नहीं दीख पड़ता।

हमने भोजन विज्ञान के 'शास्त्रीय स्वरूप' में यह प्रकट किया है कि अन्न ब्रह्मा है, रस विष्णु है और भोक्ता महेश्वरदेव है, इसका रहस्य यह है कि अन्न में सृजन-शक्ति है, उसके रस में रक्षातत्व निहित है तथा उसके परिपाक में मृत्युञ्जयत्व की विद्यमानता है। जो व्यक्ति शरीर का निर्माण, उसका संरक्षण और प्रतिगामी तत्त्वों का निराकरण चाहता है, उसे भोजन खाते समय तीन बातों का विशेष ध्यान रखना होगा। प्रथम बात—कण्ठ से नीचे मीठा खट्टा चरपरा सभी रस समान हैं, अतः प्रत्येक पदार्थ रस-रहित होकर ही पहुँचना चाहिए। क्योंकि नाभि-मण्डल में विराजमान श्रीब्रह्मा का यही भाग नियत है। यदि आमाशय में रसों का सांकर्य होगा तो मेदा खराब हो जाएगा। मल दुर्गन्धी से युक्त हो जाएगा। अतः ब्रह्मा का भाग ही ब्रह्मा को मिलना चाहिए, तभी रस-रक्त आदि का सृजन सुचारु रूप से हो सकेगा।

दूसरी बात—रस विष्णु है अर्थात् विष्णु का भाग है। विष्णु इधर अन्न में—'रसो वै सः' के अनुसार व्याप्त है, उधर जिह्वा में रसना रूप से विराजमान हैं। जिह्वाग्रवर्ती रसना ही एक मात्र समस्त रसों का आस्वादन करने वाली है, अतः भोजन का रस भाग रसना को ही प्राप्त होना चाहिए। इसलिए जब तक मुख में डाला पेड़ा मीठा मालूम पड़े तब तक उसे मुख में ही पपोलते रहना चाहिए। इसी प्रकार जब तक नमकीन पदार्थ सलोना मालूम पड़े, तब तक उसे अन्दर न ढकेलना चाहिए। नए अभ्यासी को कुछ दिन तक ऐसा करने में अड़चन अवश्य मालूम पड़ेगी, क्योंकि सतत अभ्यास के कारण प्रत्येक पदार्थ जल्दी ही गले के नीचे बैठना चाहेगा, परन्तु इस कुप्रवृत्ति से 'शनैः शनैरुपरमेत्' के अनुसार युद्ध करके यावत् रसास्वादन ग्रास को मुख में ही रखने का प्रयत्न करना चाहिए। यह तो प्रथम दिन ही विधिवत् भोक्ता को अनुभव होने लगेगा कि थोड़ी ही देर में मुख में पड़े ग्रास का खट्टा-मीठा चरपरा स्वाद क्रमशः विलीन हो रहा है और अन्त में खीर मोहनभोग दहीबड़ा सभी वस्तु फीकी बन गई है। क्योंकि हमारी जिह्वा से निकलने वाला एक स्वाभाविक जल ज्यों-ज्यों भोजन ग्रास में मिलता जाएगा त्यों-त्यों भोजन का रस विलीन होने लगेगा। इस जिह्वा से निकले पानी को आजकल के वैज्ञानिक चूने का रस बतलाते हैं। जिह्वा निस्सृत उक्त जल के सम्पर्क से क्लिन्न, भोजन-ग्रास जहां आमाशय में पहुँचकर शीघ्र जीर्ण हो जाने की योग्यता प्राप्त कर लेता है, वहाँ रस-रक्त आदि का क्रमिक विकास भी सुगमता से हो जाता है। इसलिए विष्णु का सूक्ष्म भाग रस, रसना को ही मिलना चाहिए।

तीसरी बात—परिपाक की क्रिया की स्वाभाविकता के कारण जीवननाशक प्रतिगामी तत्त्वों का जो क्षय होगा, वह हमारे प्रत्यक्ष का विषय नहीं है। अतः इसका यहां निरूपण करना अनावश्यक है। यदि पूर्वोक्त दोनों बातों पर पूरा ध्यान दिया गया तो भोक्ता साक्षात् 'मृत्युञ्जय' देव अपने आपही बन जायेंगे। इसलिए भोजन कितना चबाकर खाना चाहिए, इसकी कसौटी भगवान् ने जिह्वा नियत की है। सो जो पदार्थ जब तक रसयुक्त रहे, तब तक उसे चबाना या पपोलना चाहिए, फिर यह चाहे कड़ी कचौड़ी हो और चाहे नर्म खीर हो। इसलिए शास्त्र का स्पष्ट आदेश है कि—

अन्नग्रासो रदैः पिष्टो लालाक्लिन्नोऽन्ननाडिकाम्।
श्वासरन्ध्रं नसोरन्ध्रं चातिक्रम्य मुखं विशेत्॥
(बृहन्निघण्टु रत्नाकर १०)

अर्थात्—अन्नग्रास दांतों द्वारा भली प्रकार कुचला हुआ ही श्वास और नाक के छेद को छोड़कर मुख छिद्र में जाना चाहिए।