पूछा जा सकता है कि और तो सब बातें ठीक हो सकती हैं, परन्तु भगवान् को भोग लगाने से क्या लाभ ?—यह समझ में नहीं आता !
भोग लगाने से जो आध्यात्मिक लाभ होते हैं, उनका कुछ संकेत 'उपासना विज्ञान' प्रघट्ट में किया जाएगा, परन्तु मनोविज्ञान के अनुसार भोग लगाने से क्या लाभ होता है, यह यहां प्रकट करना अनावश्यक न होगा।
भोजन काण्ड का आधुनिक दृश्य
सभी सज्जनों ने यह अनुभव किया होगा, कि जब हम भोजन करने के लिए बैठते हैं, तो थाली परसते-ही-परसते ज्यों २ तत्तत् पदार्थों की अतीव रमणीय गन्ध चारों ओर फैलती है और उन पदार्थों के नेत्राभिराम स्वरूप को हम देखते हैं, तो मनीराम अन्दर ही अन्दर बल्लियों उछलने लगता है। मन में एक उत्कण्ठा सी, त्वरा-सी, अभिरुचि सी तरङ्गित होने लगती है। यदि भोजन करने वाला ज्वरार्त नहीं है स्वस्थ है तो मन की यही उत्कण्ठा तत्काल जिह्वा पर आकर नृत्य करने लगती है। रह रह कर जीभ में पानी भर आता है और ऐसी इच्छा होती है कि परसने वाले सज्जन कदाचित् सहस्रबाहु न सही, भगवती अन्नपूर्णा की भांति अष्टभुज या चतुर्भुज ही होते तो काली रोटी, घोली दाल और उस पर 'तस्मै भस्मै स्वाहा' सब काम एक बार ही निबट जाता। कदाचित् पंक्ति भोजन हो तो दश बीस भोक्ताओं में भोजनशाला के निकट सर्वप्रथम बैठे सज्जन के सामने स्वभावतः प्रथम परसा जाएगा, फिर क्रमशः आगे-आगे का नम्बर आएगा। बस ! अब सामने बिल्कुल सामने—जीभ से केवल डेढ़ फुट दूर रक्खे भोजन की घ्राणतर्पण गन्ध, उसका दर्शनीयतम रूप, भोक्ता को बेचैन करने लगता है। परसने वालों की तत्परतापूर्ण दौड़-धूप में भी दीर्घसूत्रता—सुस्ती का आभास होने लगता है। कभी-कभी तो मन-ही-मन ऐसे शिष्टाचार पर भी क्रोध आने लगता है, जो कि पूरी पंक्ति के पास भोजन न परसे जाने तक व्यर्थ ही सीने पर सांप लौटने के लिए बाध्य करता है।
जिनके सामने परसा जा चुका हो वे लोग अब टकटकी बांधे आतिथेय=यजमान=मेजबान के होठों की ओर उत्कण्ठित दृष्टि से ताकने लगते हैं, कि कब वह—'हां ! महाराज !' कह कर मोदकों से मल्लयुद्ध करने की आज्ञा देते हैं। ऐसे समय में यदि निरा निठल्ला मूसलचन्द, निमन्त्रित सज्जनों की तालिका निकालकर सम्भाल करने की भूल कर बैठे और चिल्ला उठे कि 'सुनो सुनो ! अभी पाधा जी तो आये ही नहीं।' बस फिर क्या था ? सभी भोक्ताओं की प्रवृद्ध आशाओं पर तत्काल तुषारपात हो जाता है। तब कोई भोक्ता यजमान को जली-कटी सुनाने लगते हैं तो कोई अभी तक न पहुँचने वाले श्रीमान् जी पर झीखते हैं। कभी-कभी तो ऐसे समय में यह काण्ड इतना उग्ररूप धारण कर लेता है, कि या तो समुपस्थित भोक्ता इस असह्य वेदना के प्रतिकार लिये बगावत का झण्डा ऊंचा करके यजमान के परमिट की प्रतीक्षा बिना किये स्वयं ही—'लड्डू चैव जलेबियां प्रतिदिनं कुर्वन्तु नो मंगलम्'—करने पर उतारू हो जाते हैं और यजमान को अगत्या 'मौन स्वीकृतिलक्षणम्' की शरण लेनी पड़ती है। या दुर्भाग्यवश कभी यजमान की उग्र मुख मुद्रा देखकर 'एज-ए-प्रोटेस्ट' वाक आउट करने की नौबत आ जाती है।
हां ! तो पाठक इस अन्तिम रंग में भंग काण्ड का ध्यान छोड़कर परसी पत्तल के सुखद स्वप्न में तल्लीन हो जाएँ। आतिथेय तार स्वर बोल उठा—श्रीमन्नारायण भगवान् की जय। भोक्ता तो पहिले से ही तैयार बैठे थे, जैसे कई बार दौड़ भाग के खेल में व्यायाम शिक्षक के एक दो कहते ही "तीन की प्रतीक्षा किए बिना, कई जल्दबाज विद्यार्थी 'तकार' उच्चारण से पूर्व ही दो डग भर चुका करते हैं, ठीक इसी प्रकार यहाँ भी यजमान द्वारा बड़े अन्दाज के साथ 'उपदेशार्थे वृत्ति कुर्य्याद विलम्बितम्' के अनुसार दूरस्थ भोक्ताओं के लिए प्लुत करके 'श्रीमन्नारायण की ३' बोला, कि 'जय' से पहिले ही पहिले यजमान के कान में चपाचप की ध्वनि पहुँच चुकती है। इतनी देर से मुंह में भरा पानी घूंटकर बड़ी त्वरा के साथ आवश्यकता से अधिक बड़े-बड़े ग्रास, बिना ही पूरी तरह चबाए पत्तल से हाथ में, हाथ से मुंह में, और मुंह से पेट में, दबादब समाने लगते हैं। इस समय जीभ को रसास्वादन की आज्ञा नहीं होती, उसका तो केवल इतना ही काम रहता है कि कुली की भांति जो बंडल मुंह में पड़े उसे तत्काल स्टोर में ढकेल दे ! लगभग एक चौथाई पेट भरने तक यही क्रम चालू रहता है, यह सब काण्ड इतनी लाघवता से सम्पन्न होता है, कि तुलसीदास जी के शब्दों में—'लेत उठावत खैंचत गाढ़े—लखा न केहि सब देखत ठाढ़े'—के अनुसार केवल रिक्तप्राय पत्तल को देखकर ही समझ में आ सकता है, कि गाड़ी कितना मार्ग लांघ चुकी है।