भोजनानन्तर बांया हाथ पेट के ऊपर दक्षिणावर्त फेरते हुये नीचे लिखा श्लोक बोलना चाहिये—

अगस्त्यं कुम्भकर्णञ्च, शनिं च बडवानलम्।
आहारपरिपाकार्थं, स्मरेद् भीमं च पञ्चमम्॥

अर्थात्—अढ़ाई चुल्लू में समुद्रपान कर जाने वाले महर्षि अगस्त्य, बहुभोजी महाकाय कुम्भकरण, जिसकी एक नजर पड़ने से ही अकाल पड़ जाता है ऐसे शनिदेव, सब कुछ भस्मसात् कर देने वाली वाडवाग्नि, और अतीव तीव्र जाठराग्नि वाले भीमसेन इन पाँच व्यक्तियों का भोजन के सम्यक् परिपाक के लिये स्मरण करना चाहिये।

कहना न होगा कि 'भावनावाद' के अनुसार प्रबल जाठराग्नि सम्पन्न, व्यक्तियों का स्मरण मनुष्य के मन में भोजनोपरान्त होने वाली स्वाभाविक ग्लानि को दूर करने में सहायक होगा। साथ ही पेट पर दक्षिणावर्त रीति से फेरा हुआ बांया हाथ—दांई कोखवर्ती आमाशय में पहुँचे हुये सद्य भुक्त भोजन को वामकुक्षीवर्ती मलाशय की ओर गतिशील बनाने में सहायक होगा।