प्रक्षालित गीली करांगुलियों द्वारा नेत्रों को छूने का प्रत्यक्ष लाभ तो तत्काल ही अनुभव होने लगता है। भोजन के समय मुख यन्त्र के व्यापार संलग्न रहने के कारण स्वभावतः समस्त शरीर में और खासकर नेत्रों में जो ऊष्मा उत्पन्न हो जाती है, वह जल की क्लिन्नता से दूर हो जाती है। इसीलिये भोजन के आरम्भ में और अन्त में हाथ, पाँव, मुख आदि अङ्गों को धोकर 'पञ्चार्द्रो भक्षयेन्नित्यम्' इस शास्त्रविधि का पालन किया जाता है।