ग्रीष्म ऋतु के अपवाद को छोड़कर अन्य किसी भी ऋतु में बाल वृद्ध रुग्ण और रात भर जगे पुरुष के अतिरिक्त सर्व साधारण को दिन में नहीं सोना चाहिए-यह शास्त्राज्ञा है यथा-

दिवास्वापं च वर्जयेत्

अर्थात्—दिन में नहीं सोना चाहिए।

यह क्यों ? इसकी हेतु परम्परा बतलाते हुए आयुर्वेद में लिखा है, कि दिन में सोने से 'प्रतिश्याय' जुकाम हो जाता है, वह चिरस्थायी होकर 'कास' रोग को उत्पन्न करता है, कास ही आगे चलकर 'श्वास' रूप में परिणत हो जाता है। श्वास के प्राबल्य से फुफ्फुस=फेफड़े खराब हो जाने पर 'क्षय' तपेदिक (T B) जैसा असाध्य रोग बन जाता है। कहना न होगा, कि इस हेतु परम्परा का सभी भुक्तभोगी व्यक्ति समर्थन कर सकते हैं। जीवन में अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं जब कि दिन में—आलस्यवशात् सो जाने पर प्रतिश्याय का आक्रमण हो जाता है। शास्त्र मर्य्यादा का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को प्रकृति कभी क्षमा नहीं कर सकती। कारणान्तर से, दण्ड मिलने में देर हो सकती है, परन्तु न मिले ऐसा अन्धेर नहीं।