अमुक्त्वा पश्चिमां कक्षां मूत्रयेद्योद्विजाधमः।
रेतोधाः पितरस्तस्य, तन्मूत्रक्लेशपूरिताः॥
(शिष्टस्मृति)
अर्थात्—धोती की पीठ वाली कक्षा=लांग को बिना खोले जो पतित द्विज मूत्र त्याग करता है, उसके रेतोधा=पितृ पितामहादि—पितर उस मूत्र के क्लेश से पीड़ित होते हैं।
कहना न होगा, कि लांग बंधे शंका करते हुए कई बार हाथ से संभाली हुई धोती छूटकर मूत्र में सन जाती है, फिर लघुशंकानन्तर जल से लिंग धोते हुए तो दोनों ही हाथ स्वतन्त्र रहने की अनिवार्य आवश्यकता रहती है, ऐसी दशा में यदि लांग खोलकर पहिले से ही कटि प्रदेश में मुड़ी हुई न होगी तो हाथ से जल लेते समय अवश्य ही छोड़नी पड़ेगी। इसलिये पतलून पैजामा-धारी बाबुओं की भांति सदैव मूत्र में भीगा सड़ियल वस्त्र पहिनना भारतीय संस्कृति में ग्राह्य नहीं। वैदिकमतानुयायी लोग तो 'कटिनिर्मुक्त कार्पास' वस्त्र को बिना धोये पुनः कभी नहीं पहिनते, इसीलिये हमारे यहाँ अधोवस्त्र का नाम ही 'धौत'=धोती रक्खा गया है जिसका अक्षरार्थ ही 'निरन्तर धुला धुलाया पहिनने योग्य वस्त्र' है।