कई लोग इस भेद को घृणामूलक समझते हैं, किंतु वास्तव में इसमें घृणा की गन्ध भी नहीं है अपितु यह तो कृपालु महर्षियों द्वारा शूद्रों के कार्यभार को देखकर एक विशेष रियायत दी गई हैं। द्विजों को जो फल समन्त्रक संस्कार करने पर प्राप्त होगा, वही फल शूद्रों को अमन्त्रक करने पर प्राप्त हो सकेगा। इसके अतिरिक्त असंस्कृत होने के कारण वे मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण न कर सकेंगे और अशुद्ध मन्त्रोच्चारण करने पर 'यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात्' वाली कथा के अनुसार प्रतिकूल फल की ही सम्भावना रहती है। इसलिए भी शूद्रों के लिए अमन्त्रक का विधान है।