ग्रीक (Greece) यूनान के निवासी श्रीगणेशजी को 'ओरेनस' (Ouranos) नाम से पूजते हैं उनके प्राचीन धर्मग्रन्थों में ओरेनस का बड़ा भारी महत्व वर्णित है। हिन्दू-धर्म ग्रन्थों के अनुसार श्री गणेश जी 'लाक्षासिन्धुरवदन' कहे जाते हैं, अर्थात्—उनका लाख के रंग के सदृश गूढा लाल रंग है, इसलिये पर्याय रूपेण उनको 'अरुणास्य' भी कहा जा सकता है। ऐसी दशा में यूनानियों का 'ओरेनस' हमारे 'अरुणास्य' का अपभ्रंश ही सिद्ध होता है।
ईरानी पारसियों में 'अहुरमजदा' (Ahurmazda) नाम से गणेश उपासना की जाती है। प्रसिद्ध 'जेन्दाअवस्ता' नामक धर्म ग्रन्थ में पचासों आयतें अहुरमजदा की लोकोत्तर शक्ति का वर्णन करती हैं। पर्सियन भाषा में संस्कृत शब्दों का सकार प्रायः हकार में अपभ्रष्ट हुआ है, जैसे—'सप्त' को 'हप्त' और 'मास' को 'माह' बोला जाता है, ठीक इसी प्रकार 'अहुरमजदा' भी 'असुर-मदह' का अपभ्रंश जान पड़ता है। पुराण ग्रन्थों में श्रीगणेश जी द्वारा अनेक असुरों का पराजित होना अंकित है इसलिये गणेश का—असुरों के मद=घमण्ड को हनन=दूर करने वाला” यह नाम भी अन्वर्थ है।
चीन और जापान के निवासी—जो कि प्रायः बौद्ध हैं—त्रिमूर्ति गणेश की उपासना करते हैं उसको वे फो (Fo) नाम से पुकारते हैं।
मिश्र देश के प्रसिद्ध इतिहासज्ञ हर्मीज (Hermes) ने लिखा है कि—“सब देवों का अग्रिम=अगला देव वह है जिसका विभाग नहीं हो सकता और जो बुद्धि का अधिष्ठाता है उसका नाम 'एक्टोन' (Eicton) है।” निःसन्देह यह देव श्री गणेश जी ही है, क्योंकि हिन्दू ग्रन्थों में अग्रपूजनीय गणेश को ही माना गया है। सम्भवतः 'एक्टोन' शब्द भी गणेश जी के अन्यतम पर्याय 'एकदन्त' का ही अपभ्रंश है।
गणेश जी के मुख्य बारह नामों की व्याख्या आगे चलकर की जाएगी, इन नामों में एक नाम 'भालचन्द्र' भी है, जिसका अर्थ—'मस्थे में चांद धारण करने वाला होता है।' जान पड़ता है मुसलमान लोग हजरत मुहमद साहिब के जन्म से पूर्व गाणपत्य सम्प्रदाय के अनुयायी थे, इसी कारण से इस्लाम मजहब को स्वीकार कर लेने पर भी वे लोग 'भालचन्द्र' की उपासना का चिन्ह—'टेढ़ा चांद और बीच में तारा का निशान'—अभी तक धारण करते आ रहे हैं। इस्लामी झण्डों इमारतों—यहां तक कि ओढ़ने की टोपियों पर भी यह मार्का बड़े गौरव के साथ अंकित रहता है। बुतपरस्ती को कुफर बताने वाले बड़े से बड़े कट्टर मुल्ला भी 'धातु से बने हुए' चमकते चांद को शिर पर चढ़ाकर 'भालचन्द्र' के इस अर्चाचिन्ह को सन्मान देते हैं। पाकिस्तान जैसा 'कठ मुल्ला नीति' पर नर्मित मुस्लिम देश भी अपने राष्ट्रीय ध्वज को भालचन्द्र चिह्न से ही अलंकृत कर रहा है।
ईसाई लोगों का परमपवित्र चिन्ह क्रास + है। यद्यपि वर्तमान समय में इसे यहूदी जमाने का मृत्युदण्ड का तख्ता समझा जाता है जिसे कि सूली किंवा फांसी की तरह हजरत यशुमसीह के प्राण लेने के लिये प्रयुक्त किया गया था, तथापि वास्तव में ऐसा मानना भ्रम है, क्योंकि जिस साधन द्वारा किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति की जान ली गई हो उस बीभत्स साधन को कोई भी मूर्ख पवित्र और पूजने योग्य नहीं मान सकता, बल्कि उसे अत्यन्त घृणित ही समझेगा। यही बुद्धि का तकाजा है। इसलिए हम तो स्पष्ट देखते हैं कि 'क्रास' + वास्तव में गणेश की प्रतिमा=卐 का ही संक्षिप्त रूपान्तर है।
गणेश के साकार विग्रह में मनुष्य के धड़ पर हाथी का मुख संयुक्त किया है—जिसका रहस्य आगे चलकर स्पष्ट किया जाएगा,—इसलिये गणेश जी के नाम 'गजवदन', 'करि मुख' 'ईभास्य' आदि प्रसिद्ध हैं ऐसी दशा में हमें तो ऐसा मालूम होता है कि 'क्रास' शब्द भी 'करि-आस्य' शब्द का ही अपभ्रंश है। जिसका—अर्थ—हाथी के मुख वाला होता है। ईसाई मत का प्रसिद्ध 'क्राइस्ट' शब्द भी करि+आस्य+इष्ट इन तीन शब्दों के संयोग का परिणाम ही जान पड़ता है। जिसका तात्पर्य हाथी के सदृश मुख वाले श्री गणेश जी को अपना 'इष्टदेव' मानने वाला व्यक्ति होता है।
हिटलरवादी जर्मनीवालों की राष्ट्रीय पताका में तो अभी तक विशुद्ध 卐 अंकित रहता है और वे इस चिन्ह को ईश्वरीय देन समझते हैं।
दक्षिणी अमेरिका (South America) के ब्रजिज नामक स्थान की खोदाई में गणेश जी की भव्य प्रतिमा प्राप्त हुई है जिसे अनुसन्धायक चार पांच हजार वर्ष से अधिक पुरानी खयाल करते हैं इस प्रत्यक्ष प्रमाण से ये दो—बातें तो निःसंदेह सिद्ध हो जाती हैं, कि ईसा की चौदहवीं शताब्दी में अमेरिका का पता लगाने वाले कोलम्बस को ही सर्व प्रथम अमेरिकान्वेषक कहना बड़ी भूल है, और कोलम्बस के परदादा के सात जन्म से भी पहिले वहां गणेश पूजक आर्य सभ्यता का प्रसार हो चुका था।
इस प्रकार उपर्युक्त समस्त प्रघट्ट पर दृष्टि डालने से सहज में ही यह परिणाम निकल आता है, कि गणेश पूजन न केवल हिन्दुओं में ही अपितु समस्त जातियों में, और न सिर्फ भारतवर्ष में ही बल्कि समूचे विश्व में पुरातन काल से आरम्भ करके अभी तक चल आ रहा है। [यहां यह भी समझ लेना चाहिए कि अमेरिका में हाथी नहीं होता। इसलिए हाथी की आकृति की कल्पना किसी प्राचीन अमेरिकन की मस्तिष्क की उपज नहीं कही जा सकती।