निषुसीद गणपते! गणेषु त्वामाहुर्विप्रतिमं कवीनाम्।
न ऋते त्वत्क्रियते किंचनारे महामर्क मघवञ्चित्रमर्च॥
(ऋग्वेद १०।११२।९)
(सायणभाष्यानुसारी भाषार्थ) हे गणपते! आप स्तुति करने वाले हम लोगों के मध्यम में भली प्रकार स्थित हूजिये। आपको क्रान्तदर्शी=कवियों में अतिशय बुद्धिमान्=सर्वज्ञ कहा जाता है। आपके बिना कोई भी शुभाशुभ कर्म (आरम्भ) नहीं किया जाता (इसलिए) हे मघवन्=ऋद्धि सि० के अधिष्ठातृ देव! हमारी इस पूजनीय प्रार्थना को स्वीकार कीजिए।
ॐ नमस्ते गणपते त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव केवलं खल्विदं ब्रह्मासि।
(गणपत्यथर्वशीर्ष)
अर्थ—हे गणपति जी! आपको नमस्कार हो। आपही प्रत्यक्ष 'तत्त्व' हो आप ही केवल समस्त चराचर के उत्पादक, पालक एवं संहारक हो आप ही निश्चय से 'ब्रह्म' हो।
शैवैस्त्वदीयैरुत वैष्णवैश्च, शाक्तैश्च सौरैरपि सर्वकार्ये।
शुभाशुभे लौकिकवैदिके च, त्वमर्चनीयः प्रथमं प्रयत्नात्॥
(गणेश-पुराण)
अर्थ—[त्रिपुरवध के अनन्तर शिवजी ने कहा कि हे गणपते!] शैव गाणपत्य, वैष्णव, शाक्त और सौर प्रत्येक सम्प्रदाय के अनुयायी लौकिक अथवा वैदिक दोनों तरह के शुभ किंवा अशुभ समस्त कार्यों में सर्व प्रथम आपको ही यत्न पूर्वक पूजते हैं।
उपर्युक्त प्रमाणों से यह निश्चित हुआ कि वेदादि शास्त्रों में अनादि अनन्त निर्विकार जगद् रचयिता जगतपालक एवं जगत्संहार कारक परमात्मा को ही गणेश माना है। हिन्दू लोग उसी सर्वाधार की सब कार्यों के आरम्भ में पूजा करते हैं।