अपने किसी कार्य्य में विघ्न न चाहनेवाले पुरुष के लिए उचित है, कि वह स्पष्टवादी हो, मानव हृदय रखता हो, मनुष्योचित कर्म्मकलाप में सतत निरत रहे एवं उसकी गति विधि मानवोचित होनी चाहिए। उक्त गुणों को सीखने के लिए उक्त चित्र में—कण्ठ, हृदय, हाथ और पांव अर्थात् कण्ठ से नीचे का सब भाग निराकार अंकित किया गया है, मनुष्य ही केवल सुस्पष्टवादी है, शेष जीव कप चट आदि विशुद्ध ध्वनि बोलने में असमर्थ हैं अतः अस्पष्टवादी हैं। इसलिए यह शिक्षा मनुष्य के अतिरिक्त अन्य किसी प्राणी के कण्ठ से अप्राप्य है सो वेद के अनुसार—'तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति' अर्थात्—मनुष्य ही अर्थानुगत वाणी बोलने में समर्थ है इसलिए गणेश का गला मनुष्य के समान नियत है।
मनुष्य ही कर्म्मयोनि है, शेष सब जीव भोगयोनि के जन्तु हैं इसलिए प्रकृति ने केवल मनुष्य को ही समस्त कार्य्य कर सकने योग्य हाथ दिये हैं। वानर इसका अपवाद कहा जा सकता है परन्तु वह भी नर का समीपवर्ती जीव होने के कारण हाथ तो रखता है किन्तु जिनसे वह खाता है उन्हीं से पांवों का भी काम लेता है। अतः उन्हें विशुद्ध हाथ नहीं कहा जा सकता, सो कर्तृत्व भोक्तृत्व की भावना एकमात्र मनुष्य में ही उपलब्ध हो सकती है। इसलिए गणेशचित्र में मनुष्य सदृश हाथ अंकित किये गये हैं, परंतु साधक को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चार पदार्थों को प्राप्त करना है, इसलिए उसे निरन्तर पुरुषार्थ-चतुष्टय की प्राप्ति के लिये चतुर्विध कर्म करते रहना चाहिये, एतदर्थ चार भुजाएं अंकित की गईं।
'सहृदय' शब्द तो केवल मनुष्य में ही चरितार्थ होता है, संसार के अन्य जन्तु केवल हृदयहीन होने के कारण ही 'पशु' कहे जाते हैं। इसलिये हृदय का आवास-स्थान उरुस्थल भी मनुष्य के ही समान उक्त चित्र में अंकित किया गया है।
गतिविधि—चाल—रफ्तार—कदम—आदि शब्दों का व्यवहार तादृश कार्यकलाप के लिये किये गये उपक्रम उद्योग किंवा कार्य प्रणाली की रूपरेखा के अर्थ में किया जाता है, सो बैल, घोड़ा, ऊँट, हाथी आदि पशुओं को उचित मार्ग में प्रवृत्त रखने के लिये, नाथ लगाम, नकेल और अंकुश की आवश्यकता रहती है तभी वे संयत रूप से कदम उठा सकते हैं अन्यथा अन्यत्र-गामी हो जाते हैं, परन्तु मनुष्य एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसकी गतिविधि ठीक करने के लिए तादृश भौतिक साधनों की आवश्यकता नहीं, किन्तु बुद्धिजीवी होने के नाते वेदादि शास्त्रों के वचन ही उसके नियन्त्रण के लिए पर्याप्त समझे गये हैं। इसलिए शास्त्र जिसे 'एष निष्कण्टक पन्था' कहे उसी सन्मार्ग पर कदम पर कदम बढ़ाते चले जाना मानव की विशेषता है, एतदर्थ उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए गणेश चित्र में मनुष्य के समान पांवों का ही उपयोग हुआ है।