यदि हम यहां चूहे की चर्चा न करें तो यह रेखाचित्र अधूरा ही रह जाए, पूरा चित्र तो तभी बनता है जबकि ऊपर महाविशाल हाथी का मस्तक! उसके नीचे साढ़े तीन हाथ के मनुष्य का छोटा सा धड़! और उसके भी नीचे अकिंचित्कर मूषक जैसे स्वल्पकाय जन्तु का क्षुद्रतम कलेवर। निःसन्देह यह वैदिक रेखाचित्र सर्वसाधारण की समझ बूझ की वस्तु नहीं है। हमने प्रायः बहुत से शास्त्रार्थों में देखा है कि आर्य्योपदेशक महाशय गणेश के आधा हाथी और आधा मनुष्य-रूप पर तो 'सनातनधर्मियों का कल्मी देवता' कहकर खूब उपहास करते हैं, परन्तु जब मूषक वाहन का प्रसंग आता है तो उनका वह उपहास आवेश और क्रोध के रूप में परिणत हो जाता है। मजाक उड़ाना भूलकर लड़ने मरने को उद्यत हो जाते हैं। हमने जब उनकी इस प्रवृत्ति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया तो मालूम हुआ कि उनका क्रुद्ध होना सहैतुक ही है, कारण? सब जानते हैं कि स्वामी दयानन्द को जो कथित बोध हुआ था वह शिवलिंग पर चुहिया को चढ़े देखकर ही हुआ था वह बात सब समाजी स्वीकार करते हैं, ऐसी दशा में आर्यसमाज की मूल उपदेष्ट्री श्रीमती चुहिया ही ठहरी, सो चुहिया में किसी भी महाशय की श्रद्धा का होना अस्वाभाविक नहीं, अब यदि सनातनधर्मियों का हस्ती मुण्ड, उद्दण्ड वक्रतुण्ड समाजियों की चुहिया पर सवार हो जाय तो उनका 'बिगड़ उठना निष्कारण नहीं। फिर सूक्ष्माङ्गी चुहिया और लम्बोदर गणेश का शारीरिक तारतम्य मिलाने पर तो यह चेष्टा और भी गुरुतर अपराधरूप में परिणत हो जाती है, परन्तु हम अपने मित्र महाशयों को नम्रतापूर्वक बता देना चाहते हैं, कि इसमें सनातनधर्मियों किंवा उनके गणेश का तनिक भी दोष नहीं क्योंकि उनकी यह चेष्टा अपनी इच्छा से नहीं किन्तु साक्षात् निराकार बाबा ने यजुर्वेद में आदेश दिया है कि—
आखुस्ते पशुः।
अर्थात्—(हे गणेश! मैं) तेरा पशु=वाहन आखु=मूषक=चूहा नियत करता हूँ।
इसलिए गणेश भगवान् बेरोक टोक मूषक महाराज पर विराजते हैं। जिस भगवान् ने आम्र जैसे विशाल वृक्ष को छोटा सा फल चिपकाया और अकिंचित्कर तरबूज, सीताफल आदि की लहलही लतिकाओं में विशालकाय फलों को संयुक्त किया उसी भगवान् ने आपकी चुहिया का श्री गणेश के साथ सामञ्जस्य भिड़ाया। अस्तु,
सम्भव है, पाठक हमारे इस उपक्रम की विशालता में नीरसता अनुभव करें, परन्तु हमने वास्तव में एक अक्षर भी इसमें अनावश्यक नहीं आने दिया है—तात्पर्य यह है कि—समस्त विघ्नों का प्रधान कारण साधक के मन में उठने वाले तर्क-वितर्क, ननु नच, किन्तु, परन्तु ही है। जो पुरुष आवश्यकता से अधिक शंकाशील होता है वह श्रीमद्भगवद्गीता के शब्दों में—'संशयात्मा विनश्यति' अर्थात् विनष्ट हो जाता है।
सो जैसे सत्त्वगुण की प्रतीक गोमाता, रजोगुण का प्रतीक सिंह और तमोगुण का प्रतीक सर्प या महिष है, ठीक इसी प्रकार तर्क का प्रतीक मूषक=चूहा है। अहर्निश काट छांट करना, अच्छी से अच्छी वस्तुओं को भी निष्प्रयोजन कुतर डालना—यह चूहे का स्वभाव है—सो अपने कार्य में विघ्न न चाहने वाले साधक को उचित है, कि वह अपनी कुतर्कों को उपर्युक्त गणेश-प्रतिमा से प्राप्त किए ज्ञान के द्वारा दबाए रक्खे, अर्थात्—तर्क को स्वतन्त्र न विचरने दे, किन्तु जैसे सवार वाहन को अपने वश में रखकर अपनी इच्छानुसार उद्दिष्ट स्थान की ओर चलाता है, ठीक इसी प्रकार 'तर्कोऽप्रतिष्ठ' के अनुसार अपनी तर्क प्रणाली को उच्छृंखल न बनाकर उसको 'वेदशास्त्राविरोधिना' रूप से वेदादि शास्त्रों की अनुसन्धायक बनाए। यही गणेशवाहन मूषक का तात्पर्य्य है।
आर्यसमाजी तथा कथित बुद्धिवादी तर्क ही को मुख्य मानते हैं, अतएव हमने बार बार अपने लेख में चुहिया को महाशयों की सम्बन्धिनी प्रकट किया है, और सनातनधर्मी प्रमाणवाद को प्रधान मानते हैं इसलिए गणेश को उनका सम्बन्धी प्रकट किया है, यही हमारे उपक्रमात्मक रूपक का तात्पर्य है।
लोकव्यवहार में मूषक, सम्पन्न घरों के प्रतीक समझे जाते हैं, दरिद्रों के यहां प्रायः 'चूहे सूखे दण्ड पेलते हैं' कहकर उनकी स्थिति का निरूपण किया जाता है। जिस नगर किंवा जिस घर में चूहे मरने लग जाते हैं वहां आने वाली विघ्न बाधाओं का सहज में ही अनुमान हो जाता है। महामारी आदि बहुत सी बीमारियों का पूर्व रूप चूहों की मृत्यु समझा जाता है। जब तक चूहे घर में आनन्द से रहें घर वालों को कुछ चिन्ता नहीं। इस दृष्टि से भी चूहों को विघ्न विनाशक गणेश के वाहन मानना सर्वथा संगत है।