(क) रुद्रो वै ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च देवानाम्। (कौषीतकी २५।१३)

(ख) ततः पतिश्च पत्नी चाभवताम्। (शतपथ १४।३।४।४)

(ग) अस्माद् वीर्य्यमुदक्रामत्। (शतपथ ७।१।२।१-६)

(घ) ततो विराडजायत। (यजु० ३१।५)

(ङ) …त्वं कुमारः… त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः।
(अथर्व० १०।८।२७)

(च) शिर इन्द्रोदवर्तयः। (ऋग्वेद ८।१४।१३)

(छ) शिरः प्रत्यैरयतम्। (ऋग्वेद १।११७।२२)

(ज) गणानां त्वा गणपतिं हवामहे। (यजु०)

(झ) लम्बोदराय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।
(गणेश गायत्री)

अर्थात्—(क) रुद्र भगवान् देवताओं में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं। (ख) तब पति और पत्नी हो गये। (ग) इससे वीर्य गिरा। (घ) तब उससे (समस्त गणों के) विशिष्ट राजा (गणपति) उत्पन्न हुए (ङ) तू कुमार=कुत्सित विघ्नों का संहार करने वाला है और तू सब ओर से मुख=मुख्य=सब देवों में अग्रपूज्य है। (च) देवाधिदेव ने उसका शिर काट डाला। (छ) पुनः अन्य शिर को संयुक्त किया गया। (ज) आप समस्त गणों के पति हैं, हम सब आपका आवाहन करते हैं। (झ) बड़ा पेट, हाथी की सूंड और एकदन्तोपलक्षित देव का हम विवेकपूर्वक ध्यान करते हैं, वह हमें शुभ कार्यों में प्रेरित करे।

पाठक उपर्युक्त पौराणिक और वैदिक दोनों स्वरूपों की तुलना करके देखें, वेद में बीजरूपेण सभी पौराणिक भावों का मूल सुस्पष्ट विद्यमान है। अब हम क्रम प्राप्त इसका आध्यात्मिक भाव प्रकट करते हैं। बनारस के 'पण्डित पत्र' में प्रकाशित एक लेख से इस अंश के संकलन में बहुत सहायता मिली है, एतदर्थ हम अज्ञात लेखक के कृतज्ञ हैं—