इस प्रकार आधिदैविक पक्ष में गणेशलोक के स्वामी भक्तों के समस्त विघ्नों को दूर करने वाले भगवान् गणेश हैं। वे 'यद्रूपं कामयते तत्तद् देवता भवति' के अनुसार भक्तों की भावना के अनुसार यथेच्छरूप बनाकर समय समय दर्शन देते हैं।
आजकल कुछ ग्रन्थ-चुम्बक पण्डितम्मन्य पाश्चात्यों के शिष्य होकर बाह्यकुसंस्कार दूषितान्तःकरण सुधारक श्री गणेशतत्त्व पर विचार करने का साहस कर बैठते हैं। वे अपने गुरुओं के विपरीत कितना विचार कर सकते हैं। उनका कहना है पहले गणेश आर्यों के देवता नहीं थे किन्तु, एतद्देशीय अनार्यों को पराजित करने पर उनके सान्त्वनार्थ गणेश को अपने देवताओं में मिला लिया गया। ग्रन्थ-चुम्बक होने के कारण कुछ पुराण, कुछ वेदमन्त्र, कुछ चौपाइयों का संग्रह कर अपनी अनभिज्ञता का परिचय देते हुए ऐसे स्वरूप में गणपति का वर्णन किया करते हैं कि जिससे शास्त्रीय गणपतिस्वरूप समाच्छन्न हो जाता है। यद्यपि थोड़े से भी तत्त्वज्ञों के लिए ऐसे असम्बद्धालाप हेय ही हैं, तथापि मूर्खों के लिए व्यामोह होना स्वाभाविक ही है। कोई इन महानुभावों से पूछे कि गणेश नाम का कोई तत्त्व है यह कैसे जाना गया? पुराणादि शास्त्रों से या यत्र-तत्र गणपति की मूर्त्तियों को देख कर। यदि शास्त्रों से ही गणेशतत्त्व समझा जाय तब तो फिर उन्हें अनार्यदेव कैसे कहा जाय, क्योंकि शास्त्र से तो वे ब्रह्मादियों के पूज्य पाये जाते हैं। यदि द्वितीय पक्ष उचित समझें तब तो उसे देवता या पूज्य समझना यह केवल मूर्खता ही है, कारण, केवल काष्ठ मृत्पाषाणादि को कौन अभिज्ञ देवता समझेगा। यदि अदृश्य देवशक्तिविशेष का आवाहन कर उस मूर्त्ति का पूजन किया जाता है, तो भी वह देवशक्ति किस प्रमाण से जानी तथा आहूत की गई है? इसका उत्तर यदि यह कहा जाय कि शास्त्र ही से यह बात जानी गई तब फिर शास्त्र ने तो गणेशतत्त्व को अनादि ईश्वर ही कहा है। फिर वह अनार्यों के देवता कैसे हुए। फिर दूसरी विलक्षण बात यह है कि शास्त्रों के भी आधार पर गणेश को अनार्यों का अभिमत देव मानना और आर्यों का बाह्य देश से आना, भारतवर्ष में प्राथमिक अनार्यों का निवास, अनार्यों के देवता गणेश को आर्यों का ग्रहण! भला ऐसी बेसिरपैर की बातें अनार्य्य शिष्यों के सिवा किसे सूझ सकती हैं? भला कोई भी सहृदय क्या वेद-पुराणादि शास्त्रों को मानता हुआ भी आर्यों का बाहर से आना तथा गणेश का अनार्य्यदेवत्व स्वीकार कर सकता है? वस्तुतः यह सब फल दूषित संस्कारों तथा आचार्यशून्य मनमाने शास्त्रों के पुस्तकी ज्ञान का है। इसीलिए ज्ञानलवदुर्विदग्ध अनभिज्ञों से भी शोचनीय समझे जाते हैं, और इसीलिए हमारे यहां किसी भी सच्छास्त्र के अध्ययन का नियम है कि आचार्य्य परम्परा से शास्त्रीय निगूढ़ रहस्यों को समझना चाहिए, परस्पर विरोधी वाक्यों का समन्वय करना चाहिए। ऐसा न होने से गणपति की भिन्न-भिन्न लीलाएँ प्राणियों को मोहित करने वाली होती हैं, जैसे उनका नित्यत्व और पार्वती पुत्रत्व शनि की दृष्टि से शिरच्छेद गजवदन का सन्धानादि।
इसीलिए गोस्वामीजी ने कहा है कि अनादि देवता समझकर गणेशादि के रूप भेद, शिव पूज्यता आदि अंगों में संशय न करें।
'जनि कोई अस संशय करै, सुर अनादि जिय जानि।