(क) शन्नो ग्रहाश्चन्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा। शन्नो मृत्युर्धूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः। (अथर्व० १९।९।१०)
(ख) अग्निर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवता आदित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता।
अर्थ—(क) चन्द्रमा के साथ सब ग्रह, सूर्य के साथ राहु, मृत्युसूचक धूमकेतु तथा विकराल रुद्रगण हमारे लिये कल्याणकारी हों। (ख) अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, अष्टवसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, ४९ मरुत, विश्वेदेव, बृहस्पति, इन्द्र, वरुण ये सब देवता हैं।
वेदादि शास्त्रों में सूर्यादि नवग्रहों की शान्ति के लिए पूजनादि का स्पष्ट विधान है। आज के अधकचरे वैज्ञानिकम्मन्य भले ही सूर्यादि ग्रहों को सर्वथा जड़ मानते रहें और तदनुयायी आलोचक भले ही वैदिक ऋषियों पर, सूर्य चन्द्रादि प्राकृतिक वस्तुओं के रहस्य से अनभिज्ञ होने के कारण उनसे भयभीत हो अपने कल्याण के लिए विविध प्रकार की स्तुति प्रार्थना करने का आक्षेप लगायें, परन्तु हमें यह न भूलना चाहिए कि दुर्जनतोष न्याय से एक क्षण के लिए इन्हें जड़ स्वीकार कर लिया जाय तब भी जिस प्रकार जड़पृथ्वी की गति-विगति के तारतम्य से संसार को भिन्न भिन्न ऋतुओं में सर्दी-गर्मी वर्षा आदि का अनुभव करना पड़ता है इसी प्रकार अन्य ग्रहों की गति-विगति का संसार पर कोई प्रभाव न पड़ता हो यह कैसे सम्भव है?
इसके अतिरिक्त जैसे अचेतन एवं जड़ रेलगाड़ी को उचित नियन्त्रण में रखने—उसे निर्दिष्ट समय पर चलने, रोकने आदि के लिए चैतन्य ड्राइवर तथा गार्ड की अनिवार्य आवश्यकता है, अन्यथा स्टेशन के सब सिगनल और लाल-हरी झण्डिये रखी रखाई रह जायँ, इसी प्रकार शास्त्रों में सूर्यादि ग्रह-पिण्डाभिमानी चेतनांश को लक्ष्य करके की गई सब प्रार्थनाएँ सर्वथा सुसंगत ही हैं।