कहा जाता है कि अमुक पुरुष पर शनि चढ़ रहा है, अमुक पर राहु केतु चढ़ रहे हैं,—यदि पुरुष पर छोटी-सी चिउंटी भी चढ़ जाए तो वह तत्काल मालूम पड़ जाती है परन्तु ये करोड़ों अरबों टन तोल के ग्रह पिण्ड चढ़े हुए मालूम क्यों नहीं होते?
लोक में जैसे मूर्खतापूर्ण चेष्टा करने पर कहा जाता है कि 'क्या तुम्हारी बुद्धि पर पत्थर पड़ गये हैं'—और अमुक बुराई करने पर उद्यत मनुष्य को कहा जाता है कि 'उसके सिर पर तो भूत सवार हो रहा है।' ठीक इसी प्रकार जब ब्रह्माण्ड के ग्रहों की स्थिति के तारतम्य से तदंगभूत मानवपिण्ड पर अमुक भलाई या बुराई के पड़ने की सम्भावना होती है तब इसी वैज्ञानिक भाव को प्रकट करने के लिए यह व्यङ्ग्यात्मक=मुहावरा बना हुआ है कि अमुक ग्रह चढ़ा हुआ है अर्थात्—उस ग्रह की दशा है। जैसे पाप और पुण्य किसी व्यक्ति को डण्डा लेकर मारने या बचाने नहीं आता किन्तु ईश्वर के न्याय से पापी की बुद्धि में विकृति हो जाती है जिससे वह अपनी हानि के लिए स्वयं ही ताना-बाना बना लेता है, इसी प्रकार पुण्यात्मा की बुद्धि वास्तविकता समझने में समर्थ हो जाती है जिससे वह दुस्तर कार्यों को भी कर सकने में सफल हो जाता है, अर्थात्—भगवान् भक्त पर कृपा करके उसे—'ददामि बुद्धियोगं तम्' के अनुसार 'बुद्धियोग' ही प्रदान करते हैं जिससे सभी काम बन जाते हैं और रुष्ट होते हैं तो 'बुद्धिनाशात्प्रणश्यति' के अनुसार बुद्धि छीन लेते हैं जिससे उसका नाश हो जाता है। सो इसी प्रकार ग्रह भी जब किसी महाशय पर चढ़ते हैं तो उसकी बुद्धि में ननु नच, तर्क वितर्क, अगर, मगर, की सनक सवार हो जाती है। जैसे उन्मत्त-प्रमत्त को अपनी खोपड़ी का विकार स्वयं मालूम नहीं पड़ता, विक्षिप्त पागल को अपने पागलपन का पता नहीं चलता परन्तु दूसरे लोग उसकी अण्ड-बण्ड बात सुनते ही तत्काल भांप लेते हैं कि 'अर्धविक्षिप्तोऽयम्' ठीक इसी प्रकार आप अपने ऊपर चढ़े हुए शनिदेव को नहीं देख पाते किन्तु साक्षर सनातनधर्मी तुम्हारी जिह्वा के हिलते ही तत्काल अनुभव कर लेते हैं कि 'देवानां प्रियोऽयम्।'