यहां इतना और भी अधिक समझ लेना चाहिए कि ब्रह्माण्ड व्याप्त तत्तद् दैवी शक्तियों का केवल 'मानव-पिण्ड' पर ही प्रभाव नहीं पड़ता अपितु घास-फूस मिट्टी पत्थर पानी जैसे जड़ पदार्थों पर भी पड़ता है। क्योंकि ये सब वस्तुयें भी ब्रह्माण्डाभिमानी किसी-न-किसी देवता से ही सम्बद्ध हैं। आयुर्वेद शास्त्र में जो अमुक लोहे लक्कड़ का क्वाथ देने की व्यवस्था की गई है वह इसी अण्ड-पिण्ड सिद्धान्त पर अवलम्बित है। रोग का तात्पर्य है—मानव-पिण्ड में रक्त, मांस, मज्जा, मेदा अस्थि, शुक्र और ओज इन तत्त्वों में से किसी तत्त्व की कमी या अधिकता हो जाना और चिकित्सा का तात्पर्य है—उसी तत्त्व को ब्रह्माण्ड व्याप्त घास फूस, अन्न, धातु आदि किसी द्रव्य से पूरा कर दिया जाय।
बीमार को छिलकेवाली मूंग की दाल खिलाने का यही हेतु है, कि रुग्ण व्यक्ति का वीर्य क्षीण हो जाता है और ब्रह्माण्ड में वीर्य स्थानीय द्रव्य पारद अर्थात् पारा है। सो, जिन द्रव्यों में पारा अधिक मात्रा में उपलब्ध हो वे द्रव्य बीमार के लिए लाभप्रद सिद्ध होंगे। सो मूंग में और खासकर उसके छिलके में पारे का अंश अधिक मात्रा में पाया जाता है। यही बात घिया और तोरी के सम्बन्ध में कही जा सकती है।
इसी तरह यकृत और प्लीहा अर्थात् जिगर और तिल्ली की बिमारियों में लोहासव, कुमारी आसव टमाटर आयरन कुनीन आदि औषधियें इसलिये दी जाती हैं, कि शरीर में खाये हुए सब पदार्थों का जो रस बनता है, वह यकृत और प्लीहा द्वारा ही रंजित होकर रक्त अर्थात् लाल रंग वाला बनता है सो इन दोनों यन्त्रों के विकृत हो जाने पर वह रंग लाल नहीं हो पाता, किंतु पीला ही रह जाता है, इसीलिये ऐसे रोगियों के नख, जिह्वा, नेत्र और मलमूत्र तक अतिपीले हो जाते हैं, सो इस रोग की निवृत्ति के लिये मंगल ग्रह से सम्बन्ध रखने वाली सब वस्तुएं औषधि के रूप में दी जाने पर लाभ होने की पूरी संभावना है। कहना न होगा कि उपरोक्त द्रव्य मांगलिक रसायन से भरपूर होते हैं।
अपामार्ग (ऊंगा) अर्क (आक) पलाश (ढाक) खदिर (खैर) उदुम्बर (गूलर) अश्वत्थ (पीपल) और कुशा इन सातों औषधियों में सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, और शनि, सातों महाग्रहों के क्रमशः विशेष तत्त्व विद्यमान हैं। इसी प्रकार सोने, चांदी, तांबा, पीतल, कांसी, पारा और लोहा—इन सातों धातुओं में, तथा मणिक मोती विद्रुम (मूंगा) पन्ना, (पिरोजा) पद्माख (पुखराज) वज्र (हीरा) नीलमणि नीलम इन सात रत्नों में क्रमशः सूर्यादि सात महाग्रहों के विशेष अंश उपलब्ध होते हैं। सो मानव-पिण्ड में जब जिस देवता के प्रदत्त तत्त्व में न्यूनता किंवा अधिकता आ जाये तो उसके तारतम्य को ठीक करने के लिए तत्तद् औषधियों की विधिवत् उपासना की जाती है, यही आयुर्वेद शास्त्र का मूल सिद्धान्त है।
प्रत्यक्ष देखने में आता है, कि सुदूर आकाश में अवस्थित ग्रहों का प्रभाव पृथ्वी के जड़-पदार्थों पर भी पर्याप्त मात्रा में पड़ता है। पौर्णिमा का पूर्ण चन्द्रमा समस्त पृथ्वी को उद्वेलित करता है यद्यपि ठोस होने के कारण पाषाण, वृक्ष और मृत्तिका आदि पदार्थों में हम उस आकर्षण विकर्षण की प्रगति को नहीं देख पाते, परन्तु तरल होने के कारण अनन्त-जल-राशि समुद्र को बल्लियों उछलता प्रत्यक्ष देखते हैं।
शनि की उच्च नीचता के तारतम्य से नीलम की आभा में भी तारतम्य हो जाता है। यह अनेक रत्न परीक्षक जोहरियों की जबानी हमें मालूम हुआ है। सो इन्हीं विज्ञानपूर्ण भावनाओं के आधार पर भारतीय ऋषियों ने मानव पिण्ड की उन्नति के लिये किये जाने वाले प्रत्येक कार्य में अधिकाधिक सफलता प्राप्त करने के निमित्त ग्रह नक्षत्र तारे, सैयारे, और धूमकेतु, उल्का पिण्डों के तारतम्य से तैयार होने वाले विशिष्ट वातावरण "कुर्रे हवाई" किंवा "ऐटमास्फीयर" की अनुकूलता निर्माण करना ही नव-ग्रहपूजन का वास्तविक उद्देश्य माना है।