आरब्ध कर्म के निर्विघ्न परिसमाप्त्यर्थ जैसे प्रत्येक संस्कार के प्रारम्भ में गणपत्यादि देवों का पूजन आवश्यक है इसी प्रकार प्रायः सभी धार्मिक अनुष्ठानों में हवन भी तदङ्गभूत होने के कारण करणीय है यह सर्वतन्त्र सिद्धान्त है। आज के इस युग में प्रत्यक्षवाद में पले हुवे व्यक्ति तो हवन को, तत्तद् बहुमूल्य पदार्थों को अग्नि में व्यर्थ फूंक देने की जङ्गली प्रथामात्र समझते हैं परन्तु प्रत्यक्षवादियों की यह धारणा वैसी ही भ्रमपूर्ण है जैसी कि किसान को कीमती अन्न खेत की मिट्टी में डालते हुवे देखकर किसी कृषि-विज्ञान से अपरिचित व्यक्ति की हो सकती है।
हमें यत्र-तत्र यज्ञ-यागादि करते कराते हुवे आजकल प्रायः सर्वत्र ही कम्यूनिस्ट सोशलिस्ट एवं अधकचरे कांग्रेसियों द्वारा किये गए विरोध का सामना करना पड़ता है अतः हमें यह अनुभव है कि आज का कथित शिक्षित-समाज एक साधारण किसान जितना भी भौतिक विज्ञान नहीं जानता है। घर में नपा तुला अन्न हो, घर के बालक आधा पेट खाते हों, तब भी चतुर किसान पाषाण का हृदय बनाकर सब अन्न खेत की मिट्टी में मिला डालता है। घर में अन्न का दाना न हो तब भी गहना पत्ता बेच कर, उधार उठाकर यथातथा—बीज जुटाने का प्रयत्न करता है। प्रत्यक्षदर्शी अनभिज्ञ लोगों की दृष्टि में उसकी यह चेष्टा भले ही मूर्खतापूर्ण जचती हो परन्तु बुद्धिमान् कृषक को विश्वास है, कि खेत की मिट्टी में मिलाया हुवा उसका प्रत्येक अन्नकण शत-सहस्र गुणित होकर पुनः प्राप्त होगा, यद्यपि अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मूषक, शुक, शलभ और राजसेनाओं के गमनागमन रूप ईतियों की भीति किसान के सिर पर खड़ी रहती है उसे कोई यह गारन्टी नहीं दे सकता कि खेत में डाला हुवा यह अन्न अवश्य ही उसे निर्बाधरूपेण वापिस प्राप्त होगा ही, तथापि प्रारब्धवादी पुरुषार्थी किसान भगवान् के भरोसे पर ही पीढ़ियों से अपना कर्तव्यपालन करता चला रहा है।
यही बात यज्ञ के सम्बन्ध में समझनी चाहिए। किसान का यज्ञ पार्थिव यज्ञ है और यह तैजस्। कृषि दोनों हैं एक आधिभौतिक है तो दूसरी आधिदैविक। एक का फल है—स्वल्पकालीन तृप्तिक्षम अनाजों के ढेर, तो दूसरे का फल देवताओं के प्रसाद से अनन्तकालीन तृप्ति! इसीलिए यह कृषि, की भी दूसरे ही तरीके से जाती है। देवता सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण 'अन्नाद' नहीं हैं अतः 'द्रव्य' को विधिवत् अग्नि में होमकर उसे सूक्ष्मरूप में परिणत किया जाता है। अग्नि में डाली हुई वस्तु का स्थूलांश भस्म रूप में पृथ्वी पर रह जाता है। स्थूल-सूक्ष्म-उभय-विमिश्रित भाग धूम बनकर अन्तरिक्ष में व्याप्त हो जाता है जो अन्ततोगत्वा मेघरूप में परिणत होकर पुनरपि भूमि पर जलरूप में बरसता है और सूक्ष्मतम भाग अर्चि रूप में परिणत होकर द्युलोकस्थ देवगण को परितृप्त करता है। 'स्थूल सूक्ष्मवाद' सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक अंश अबाध गति से अपने अंशी तक पहुँचकर ही विश्राम लेता है। मृत्पिण्ड ऊपर फेंका हुआ पुनरपि भूमि की गोद में स्थिर होता है, जल-प्रवाह अपने आदिम उद्गम स्थान समुद्र में पहुँचे बिना दम नहीं लेता, इसी प्रकार भौतिक अग्नि की प्रत्येक अर्चि ब्रह्माण्ड भर में व्याप्त तैजस पदार्थों के आदिम-मूल-केन्द्र सूर्य में पहुँचे बिना परिसमाप्त नहीं होती। यह वैज्ञानिक विवेचन श्रीमनुस्मृति के—
'अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठते'
(मनु० ३।७६)
अर्थात्—अग्नि में विधिवत डाली हुई आहुति, सूर्य में उपस्थित होती है—आदि श्लोकों में सूत्ररूपेण विद्यमान है।
यहां पदार्थ-विज्ञान के अनुसार यह समझ लेना चाहिए कि जैसे विधिवत् मिट्टी में मिला अन्न-कण शत-गुणित हो जाता है, ठीक इसी प्रकार जल में मिला पदार्थ सहस्र-गुणित, और अग्नि में मिला लक्ष-गुणित हो जाता है। यहां शत, सहस्र लक्ष आदि शब्दों का प्रयोग केवल समझाने की दृष्टि से किया गया है। तात्पर्य्य केवल इतना ही है कि पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश इन पञ्च महाभूतों के संसर्ग से तत्तत् पदार्थ-जात उत्तरोत्तर अधिकाधिक व्यापक रूप में परिणत हो जाते हैं। खेत में बोये हुए अन्न की अभिवृद्धि सर्वसाधारण को भी विदित है परंतु जलादि के संसर्ग से वस्तु की व्यापकता जानने के लिए जरा गहराई में गोता लगाना पड़ता है।
हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि आयुर्वेद की पद्धति में अमुक गुटिका शीतोष्ण जल किंवा किसी अनुपान विशेष के साथ देने की विधि चली आती है। ऐलोपैथिक डाक्टर लोग भी अमुक द्रव्यों को जल में मिलाकर 'मिक्स्चर' ही अधिकतया देते हैं। होम्योपैथी चिकित्सा-पद्धति की तो स्थापना ही इस सिद्धान्त पर हुई है, कि औषधि की जितनी मात्रा जो गुण रखती है यदि उसे फिल्टर किये पानी में मिलाकर ज्यों-ज्यों न्यूनतम किया जाए त्यों-त्यों वह अधिकाधिक गुणप्रद बनती जाती है, अर्थात् दवाई की एक बूंद में जो गुण है उसे यदि दशगुणित पानी में हल करके एक बूंद ली जाए तो वह दशगुणित रोगनाशनी—शक्ति-सम्पन्न बन जाती है, इसी प्रकार उत्तरोत्तर आगे भी यह वृद्धिक्रम जल-संसर्ग से तथैव जारी रहता है, कहना न होगा कि ये सब क्रियाएं इस सिद्धान्त की परिचायक हैं कि जल में मिश्रित हुआ पदार्थ सहस्र-गुणित हो जाता है।
अग्नि के संसर्ग से पदार्थ की व्यापकता का अनुमान लगाने के लिए अधिक दौड़-धूप करने की आवश्यकता न होगी, आप भले ही नित्य एक लाल मिरच खाते हों परंतु वह एकले आप को ही अपनी चरचराहट से परिचित कराती है परंतु यदि आप उसको अग्नि में डाल कर तमाशा देखना चाहें तो वह न केवल घर भर के लोगों को बल्कि पास पड़ौस तक के व्यक्तियों को भी अपनी गन्ध से 'आछी आछी' करने को विवश कर डालेगी। रत्ती भर हींग का छौंक महल्ले भर में सूचना दे देता है, कि आज श्रीमन्नारायण के यहां कढ़ी बनाई जा रही है। गांवों में गुड़ पकने की भीनी २ गन्ध वायु के संसर्ग से दूर तक आगन्तुकों की घ्राण को आप्यायित करती है। मोटर बसों में जलते हुए पेट्रोल की दुर्गन्ध और आयल इंजनों में जलते हुए क्रूड आयल की बदबू सर्व साधारण के सिर में दर्द पैदा कर देती है, गाड़ियों में बीड़ी सिगरट की धुवाधार से, न पीने वाले सैंकड़ों व्यक्ति परेशान हो कर नाक पर कपड़ा डालने के लिए विवश हो जाते हैं, इन सब दृष्टान्तों का एक ही तात्पर्य है कि अग्नि में डाली हुई वस्तु लक्षगुणित हो जाती है।
सो हवन में जो द्रव्य डाले जाते हैं वे सब अनन्त गुणित होकर देवगण को परितृप्त करते हुए, अन्त में कर्ता को नानाविध भोगों के रूप में उपलब्ध होते हैं।
आर्य्यसमाज की मान्यता है, कि हवन का प्रयोजन 'वायुशुद्धि' है, परन्तु उनकी यह मान्यता प्रत्यक्षवाद पर आधारित एक अकिंचित्कर मान्यता ही है, हवन के अनेक लाभों में 'वायु शुद्धि' भी अन्यतम लाभ हो सकता है परन्तु हवन का मुख्य प्रयोजन तो परमात्मा के अंगप्रत्यंग भूत देवगण को परितृप्त करके स्वयमपि तत्तत् पदार्थों के भोक्ता हो सकने की योग्यता प्राप्त करना है। जैसे आम पर बैठे हुए कव्वों को देखकर कोई मनुष्य यह कहने लगे कि आमवृक्ष के लगाने का प्रयोजन कव्वे महाशयों के लिए चौपाल प्रस्तुत करता है! अथवा वृक्ष की ठण्डी छाया को देखकर कोई उसे ही वृक्ष का सर्वोपरि प्रयोजन मान बैठे! ये मान्यताएँ प्रत्यक्ष सिद्ध होती हुई भी वास्तविकता से कोसों दूर हैं। आम्रवृक्ष का प्रयोजन यथार्थतः रस परिपूरित सुमधुर फल हैं जो कि समय आने पर उपलब्ध होते हैं।
यदि वास्तव में हवन का उद्देश्य 'वायु शुद्धि' ही है तो फिर घर में बैठकर तोला दो तोला घी फूंक देने से वायु क्या शुद्ध होगी? इसके लिये तो महाशय लोग यदि ईस्ट पंजाब रेलवे या ईस्ट इण्डिया रेलवे की सेवायें प्राप्त करें तो ज्यादा लाभ हो सकता है! सारी सामग्री इकट्ठी करके रेलवे के पास पहुँचा दें और वहां से उसे यदि इंजन में झोंका जाय तो न केवल महाशय जी के घर की, न केवल उनके गांव नगर या जिले की, किन्तु अमृतसर से लेकर सुदूर बंगाल तक की वायु ही शुद्ध न हो जाय!! और फिर देश में कभी कोई बीमारी ही न फैले। बलिहारी ऐसी अक्ल की!
इसलिये यह समझ लेना चाहिए कि हवन का प्रयोजन प्रत्यक्ष घ्राण तर्पण अनुभव अथवा वायु शुद्धि मात्र नहीं है किंतु देवाराधन पूर्वक भगवत्परिचर्य्या है जिसका सुमधुर फल इस लोक में अभ्युदय के रूप में और परलोक में निःश्रेयस् के रूप में यथासमय कर्ता को प्राप्त होता है।