वैदिक वाङ्मय में गाय की लोकोत्तर महिमा का विस्तृत उल्लेख विद्यमान है तदनुसार सभी सम्प्रदायों के हिन्दु अन्यान्य विषयों में मतभेद रखते हुवे भी गौ का समान आदर करते हैं। यह आदर केवल परम्परागत अन्धविश्वास पर अवलम्बित हो सो बात नहीं किन्तु गाय की उन लोकोत्तर विशेषताओं पर अवलम्बित है जो कि भगवान् ने अपनी अनन्त सृष्टि में एकमात्र इसी जीव को प्रदान की हैं। यद्यपि गाय के विषय में 'हमारा गोधन' नामक एक स्वतन्त्र पुस्तक में हम बहुत कुछ लिख चुके हैं तथापि 'क्यों ?' में गोमाता का सर्वथा उल्लेख ही न होना जहां ग्रन्थ के गौरव को घटाने का कारण बनता है वहां पाठकों को भी गो-महिमा के पुण्यपाठ से प्राप्त होने वाले असीम लाभों से वञ्चित रखने का हेतु बनता है। एतदर्थ हम यहां गोमहिमा का संक्षिप्त दिग्दर्शन करते हैं यथा—
शास्त्रीय-स्वरूप
(क) गोस्तु मात्रा न विद्यते (ऋग्वेद)
(ख) यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरंचित्
कृणुथा सुप्रतीकम् (अथर्व ४।२१।६)
(ग) सर्वे देवाः स्थिता देहे (बृहत्पाराशरस्मृति ३।३३)
(घ) मातरः सर्वभूतानां गोषु पाप्मा न विद्यते। (महाभारत)
(ङ) गावो नो परमा मित्ता (ब्राह्मण धम्मिय सुत्त १३।१४)
अर्थात्—(क) गाय द्वारा होने वाले लाभों की कोई गणना ही नहीं है। (ख) गाय का दूध बलिष्ठ बनाता है, और बेडोल मुटापे को हटा कर सननाग बना देता है। (ग) गाय के देह में सब देवताओं का निवास है। (घ) गाय सब प्राणियों की माता है, गव्य पदार्थों में यक्ष्मा बीमारियों के कीटाणुवों को दूर करने की शक्ति विद्यमान है (ङ) गाय मानव समाज की परम मित्र है।
वेदों में गाय को माता कहा गया है यह श्रद्धातिरेक के कारण नहीं किन्तु वस्तुतः ही गाय मानव समाज की माता है, क्योंकि यदि चंद महीने वर्ष या दो वर्ष स्तन पिलानेवाली जननी मां है तो फिर आजीवन दूध पिलाने वाली और मरने पर पांवों की रक्षार्थ अपना चर्म प्रदान करने वाली करुणामयी पुत्रवत्सला गौ, माता नहीं तो और क्या हो सकती है। इसके अतिरिक्त चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ जीव मनुष्य योनि में उत्पन्न होने से पूर्व गो जाति में ही जन्म लेता है, क्योंकि तमोगुण और रजोगुण प्रधान सर्प, सिंह आदि योनियों के अनन्तर पशुओं में सर्वाधिक सत्त्व प्रधान जन्तु केवल गाय ही है इसीलिये भी गौ मानव समाज की जननी है।
मत्स्य, कुक्कुट, सूकर जैसे मलभोजी जानवरों के मलाशयों तक का माँस भक्षण करने वाले कई अहिन्दू गाय के दूध, दही, घृत, गोमूत्र और गोमय द्वारा वैज्ञानिक विधि से निर्मित पञ्च गव्य के पान पर कटु आक्षेप किया करते हैं। परन्तु वे स्वयं नित्य मधु मक्खियों की वमन=शहद और बारहसिंगे की भस्म तथा हिमालय के वानरों की विष्ठा=शिलाजीत तथा मनुष्य की विष्ठा से निर्मित नौसादर को तोलों के भाव से खरीद २ कर खाते हैं।
वास्तव में वस्तु विशेष की पवित्रता और अपवित्रता उसके तत्तद् गुणों पर ही निर्भर है। यकृत और प्लीहा की खराबी को दूर करने के लिये 'गोमूत्र' के गुणों का परीक्षण हमने स्वयं किया है। वैद्य और डाक्टरों की बहुमूल्य औषधियें जिस रोग को चार वर्ष तक सेवन करने पर भी दूर न कर सकी, वही रोग गोमूत्र सेवन से चन्द दिनों में काफूर हो गया। गोमय मक्खी, मच्छर, रोग कीटाणुओं तथा सील सीमक आदि दोषों को दूर करने में अमोघ है। इसमें गन्धक और पारद के तात्त्विक अंश प्रचुर मात्रा में होते हैं। नये अनुसन्धान में गोबर से एक विशेष प्रकार की गैस उत्पन्न की गई है और उससे बिजली पैदा करके गांवों को प्रकाशित करने का प्रयोग चल रहा है।
प्रभु के अनन्त धन्यवाद के साथ इस भाग को हम यहीं समाप्त करते हैं। अस्तु,
सुकवि तुलसी की विदित भणन्त,
अमित हरि औ, हरि कथा अनन्त।
सहैतुक कतिपय कहे सुकर्म्म,
यही अध्याय तुर्य्य का मर्म ॥