यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि अमुक पुरुष विष खाने से मर गया और कदाचित् उपचार करने पर, न भी मरा तब भी शास्त्र-दृष्टि से वह पापी है और अदालत में भी आत्महत्या करने के उद्योग के अपराध में उसे उचित दण्ड दिया जाता है। कदाचित् उस विषकाण्ड में यह सिद्ध हो जाय कि विष अमुक ने खिलाया था और अमुक से खरीदा गया था तब वे सब व्यक्ति भी 'आत्महत्या' में सहायक होने के कारण दण्ड भागी होंगे। इस प्रकार लोक और शास्त्र दोनों में ही विष का खाना और खिलाना अक्षम्य अपराध माना जाता है, परन्तु सभी चिकित्सक नित्य प्रति अपने रोगियों को नानाविध विष खिलाते हैं और रोगी बराबर खाते हैं तथापि वे गिरफ्तार नहीं किये जाते, किन्तु इसके विपरीत वैद्यों को वेतन शुल्क और अनेकविध पुरस्कार मिलते हैं, और रोगी भी स्वास्थ्य प्राप्त करके दीर्घजीवी बनते हैं। कहना न होगा कि इस उदाहरण में प्रथम विष-काण्ड से सम्बद्ध सब व्यक्ति अपराधी क्यों समझे गये ? और द्वितीय विष-काण्ड के सब व्यक्ति पुरस्कारार्ह क्यों माने गए ? इन दोनों प्रश्नों का सही उत्तर यही हो सकता है कि प्रथम काण्ड में एक व्यक्ति मरने के लिये मनमाने ढंग से विष भक्षण करता था और अन्य सब सम्बद्ध व्यक्ति उसकी मृत्यु में सहायक बने थे अतः वे अपराधी थे, दण्ड के योग्य थे। परन्तु द्वितीय काण्ड में रोगी मनुष्य, जीवन-वृद्धि के लिए—विषशोधन की शिक्षा में निष्णात वैद्य की व्यवस्था के अनुसार यथाविधि विष खाता है, अतः वह विष मृत्यु का कारण न बनकर 'विषस्य विषमौषधम्' के अनुसार शरीरस्थ अनेक विषों को दूर करने के लिये 'अमृत' का कार्य करता है अतः उसे पुरस्कारार्ह समझना स्वाभाविक है।
ठीक, इसीप्रकार संसार के सब विषयोपभोग हालाहल विष तुल्य हैं। जो व्यक्ति मनमाने ढंग से इनका सेवन करता है वह अनेक बार मरता है, परन्तु यदि उन्हीं विषय रूप विष-समूह को शास्त्र निष्णात गुरु रूप वैद्य की धर्म व्यवस्था के अनुसार यथाविधि सेवन किया जायगा तो (पुनर्जन्म का सिलसिला ही समाप्त हो जाने के कारण बार-बार) मरना न पड़ेगा। इसलिये मनुष्य को अपने समस्त कार्य शास्त्रविधि के अनुसार करने चाहिये।