रोटी के खाने से पेट भरता है यही रोटी खाने का उद्देश्य है, फिर उसमें—'यूँ खाओ, यूँ न खाओ' का अड़ङ्गा लगाना व्यर्थ है। क्या तथाकथित विधि के अनुसार खाने से डबल पेट भर जाता है ? इसीप्रकार अन्यान्य बातों में भी विधि-विधान का पचड़ा लगाना क्या कोरी पोपलीला नहीं है ?
ऐसी आशङ्का करने वाले व्यक्ति शायद यह भूल जाते हैं कि मनुष्यों और पशु-पक्षियों में आहार निद्रा भय मैथुन खाना पीना सोना सन्तान उत्पन्न करना-आदि चेष्टाएँ तो समान ही हैं; दोनों ही पेट भरते हैं, दोनों ही सोते हैं और दोनों ही सन्तान उत्पन्न करते हैं, परन्तु इस प्रत्यक्ष का अपलाप नहीं किया जा सकता कि पशु पक्षी आदि तिर्यञ्च, मनुष्य की अपेक्षा जल्दी मर जाते हैं। बैल और भैंसा, मनुष्य की अपेक्षा कई गुना अधिक खाता है, उसका शरीर भी मनुष्य की अपेक्षा बहुत ही सुसंगठित एवं दृढ़ होता है। तदनुसार बल भी अपेक्षाकृत बहुत अधिक होता है। परन्तु यह सब कुछ होते हुए भी वह आयुष्य में मनुष्यों से बहुत कम जीता है। प्रकृति का यह नियम है कि जो पिण्ड जितने काल में सर्वांगपूर्ण उन्नत होगा वह उससे चार पाँच गुणा अधिक काल तक जी सकेगा।
जैसे मनुष्य शरीर बीस वर्ष की आयु में सर्वांगपूर्ण उन्नत हो जाता है, अर्थात् आयुर्वेद के—'बाल्यं वृद्धिर्द्युति प्रज्ञा त्वग् दृष्टिः शुक्रविक्रमौ' के अनुसार क्रमशः प्रथम दश वर्ष तक बालकपन रहता है इससे आगे नहीं रहता। अगले दश वर्षों तक वृद्धि=अंगों का बढ़ना चालू रहता है इससे आगे नहीं। इसी प्रकार अगली दशाब्दियों में कान्ति बुद्धि त्वचा दृष्टि वीर्य और पराक्रम समझ लेने चाहिये। यही मानव शरीर के विकास का कच्चा चिट्ठा है। सो, बीस वर्ष में युवा होने वाला मनुष्य साधारणतया सौ वर्ष तक जी सकता है। इसीप्रकार कुत्ता दूसरे वर्ष में युवा हो जाता है और अन्यून आठ वर्ष जीता है। बैल और घोड़ा प्रायः तीन वर्ष के बाद पूर्णाङ्ग हो जाता है तदनुसार उसकी पूर्णायु भी बारह चौदह वर्ष होती है। ऊँट ६ वर्ष का युवा होता है तो वह पच्चीस तीस वर्ष जी सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हाथी घोड़ा ऊँट सभी तिर्यञ्च जीव, मनुष्य की अपेक्षा अन्य सब बातों में उन्नत होते हुए भी आयु के उपभोग में उससे पिछड़ जाते हैं। इसका क्या कारण है ?
यदि विचारपूर्वक इस समस्या का मनन किया जाय तो एक मात्र यही समाधान समझ में आ सकता है कि उक्त जीव खाते-पीते सोते और सन्तान अवश्य उत्पन्न करते हैं परन्तु वे पशु होने के कारण उक्त सब कृत्यों की विधि नहीं जानते। मनमाने ढंग से स्वेच्छावश जब जो चाहा खाया, जब जहाँ चाहा मल-मूत्र का त्याग किया। जब जैसे चाहा सोते रहे और जब जहाँ चाहा सन्तान उत्पन्न करने को प्रवृत्त हो गए। हम नित्य प्रत्यक्ष देखते हैं कि बैल भैंसा जब जिस तालाब में जल पीता है तब उसी तालाब में साथ ही साथ मूत्र का त्याग करता है, उसे यह ज्ञान नहीं कि इस तरह यह मूत्र लौटकर मेरे ही पेट में आ जायगा। वे कितनी बार खाते हैं और कितनी बार गोबर करते हैं इसका कुछ नियम नहीं। दिन भर ही दोनों कृत्य चलते रहते हैं। सन्तान उत्पन्न करते समय माँ बहन जो भी सामने आ गई तत्काल वहीं व्यवाय में प्रवृत्त हो गए। बस, यह कामाचार और कामभक्षता की प्रवृत्ति ही तिर्यञ्चों की सद्यः मृत्यु का कारण है।
लोक में यह प्रत्यक्ष देखने में आता है कि यदि दश साल की गारन्टी वाली घड़ी खरीदकर कोई अनजान व्यक्ति उसमें उल्टी चाबी भरने लगे तो वह तत्काल ही बेकार हो जाएगी ! 'गारंटी' का अर्थ तो यही हो सकता है कि यदि उस वस्तु को विधिवत् बर्ता जाय तो वह नियत काल तक काम दे सकती है। अपने हाथों हथौड़ों से तोड़ते समय गारन्टी-पत्र उसकी रक्षा नहीं कर सकता। ठीक इसी प्रकार मानव-पिण्ड की जीवन गारन्टी—'शतं जीवेम' के अनुसार साधारणतया अन्यून सौ वर्ष है, परन्तु यह तभी सम्भव है जबकि मनुष्य की जीवनचर्य्या शास्त्रविधि पर अधिष्ठित हो। इसलिये शास्त्रविधि को ढकोसला और पोपलीला बताकर कामाचार कामभक्ष प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देना मानो, मानव समाज को 'साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः' बनने के लिये प्रोत्साहित करना है।