(ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थं चानुचिन्तयेत्—मनु)
धर्मशास्त्रों ने निद्रा त्याग के उपरान्त मनुष्य-मात्र का प्रथम कर्तव्य उस कोटि २ ब्रह्माण्ड-नायक, सच्चिदानन्द-स्वरूप प्यारे प्रभु का स्मरण करना बतलाया है—जिस की असीम कृपा से अत्यन्त दुर्लभ मानव देह प्राप्त हुई है, जो समस्त सृष्टि के कण-कण में ओतप्रोत है, सत्य है, शिव है, सुन्दर है। जिसकी कृपा-कोर से मनुष्य सब प्रकार के भयों से मुक्त होकर—'अहं ब्रह्मास्मि' के उच्च लक्ष्य पर पहुँच कर तन्मय हो जाता है। दैनिक जीवन के प्रारम्भ में उस के स्मरण से हमारे हृदय में आत्मविश्वास और दृढ़ता की भावना ही उत्पन्न नहीं होगी अपितु सम्पूर्ण दिन मंगलमय वातावरण में व्यतीत होगा। प्रत्येक व्यक्ति को अपने २ विश्वास और भावना के अनुसार भगवत्स्मरण करने की पूरी स्वतन्त्रता है। जो व्यक्ति विशेष कुछ नहीं जानते वे यदि श्रद्धापूर्वक राम नाम महामन्त्र का ही स्मरण करें तो भी कल्याण भाजन हो सकते हैं।
उक्त विषय का विस्तार तो आह्निक सूत्रावली आदि दिनचर्या विधायक ग्रन्थों में द्रष्टव्य है। हम यहाँ विशेष वक्तव्य योग्य एक पद्य ही उद्धृत करते हैं यथा—
प्रातः स्मरामि भवभीतिमहार्तिशान्त्यै,
नारायणं गरुडवाहनमब्जनाभम्।
ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं,
चक्रायुधं तरुणवारिज-पत्र-नेत्रम्॥