मातृ-भूमि वन्दना भी प्रातःकालीन कृत्यों में से आवश्यक कृत्य है। कर दर्शन के अनन्तर शास्त्रकारों ने मातृ-वन्दना का विधान किया है। निम्नलिखित प्रार्थना के साथ पृथ्वी को स्पर्श करते हुए यह वन्दना की जाती है।

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि ! नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥

अर्थात्—हे समुद्ररूपी वस्त्रों वाली, पर्वत-रूपी स्तनों से विभूषित, विष्णु-पत्नि ! मैं तुझे प्रणाम करता हूँ, मेरे पादस्पर्श को क्षमा करना।