शय्या परित्याग के बाद शौच स्नानादि नित्य कृत्य करने चाहिये। इस विषय में प्रसंगवश यह भी लिख देना उचित होगा कि प्रातःकाल सर्वप्रथम जिन पदार्थों पर हमारी दृष्टि पड़े वे ऐसे न होने चाहिये कि उनको देखने से हमारे हृदय में ग्लानि क्रोध, विषाद आदि भावों का उदय हो।

धर्मशास्त्रकारों ने उपर्युक्त भाव को हृदय में रखकर प्रभात काल में दर्शनीय तथा अदर्शनीय पदार्थों का वर्गीकरण किया है जो कि सर्वथा मनोविज्ञान की भावनाओं पर अवलम्बित है। मनोविज्ञान बतलाता है कि मन की निश्चल एवं शान्त अवस्था में जो वस्तु उसके सम्पर्क में आयेगी उसका मन पर अधिक से अधिक प्रभावोत्पादक संस्कार पड़ेगा और वह संस्कार चिरस्थायी रहेगा। प्रभात काल में जब हम अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः प्राप्त करके उठते हैं, उस समय मन एवं मस्तिष्क दोनों, अपेक्षाकृत हल्के स्वस्थ एवं शान्त होते हैं। मन का कार्य है मनन करना—आभ्यन्तरिक विचार सृष्टि की रचना करना। प्रातःकाल उठने के बाद जो वस्तु सबसे पहिले उसे दिखाई दी, उसने उसी के बारे में मनन प्रारम्भ किया। फलतः हमारा आभ्यन्तर वातावरण उस मनन से प्रभावित होगा और दिन भर उससे मुक्त न हो सकेंगे। यदि वह वस्तु भली हुई=कल्याण कारक हुई–तो विचारों की उत्तमता अनिवार्य है यदि वह अच्छी न हुई–हृदय पर उसका अच्छा प्रभाव न पड़ा–तो या तो तत्सम्बन्धी विचारों में मन संकुचित हो जायगा या उसकी प्रवृत्ति बुरे ही कार्यों में होगा। इसलिए लोग कहा करते हैं कि—आज तो ऐसे का मुँह देखा कि रोटी भी नसीब न हुई। यह धारणा भ्रान्त नहीं, किन्तु वेदमूलक है और सर्वथा मनोविज्ञान पर आश्रित है।

छान्दोग्य परिशिष्ट में इसका वर्णन करते हुए लिखा है—

श्रोत्रियं सुभगां गाञ्च अग्निमग्निचितं तथा।
प्रातरुत्थाय यः पश्येदापद्भ्यः स विमुच्यते॥

अर्थात्—जो पुरुष प्रातः उठकर वेदपाठी विद्वान् पुरुष, सौभाग्यवती स्त्री, गौ, अग्नि तथा याज्ञिक का दर्शन करता है वह आपत्तियों से विमुक्त हो जाता है। इसके विपरीत—

पापिष्ठं दुर्भगां मद्यं नग्नमुत्कृत्तनासिकम्।
प्रातरुत्थाय यः पश्येत्तत्कलेरुपलक्षणम्॥

अर्थात्—प्रातःकाल उठकर इन वस्तुओं का दर्शन साक्षात्कलियुग का दर्शन है—पापी पुरुष, दुराचारिणी स्त्री, शराब, नंगा और नकटा पुरुष।

इन दोनों श्लोकों का सामञ्जस्य करने पर पाठक स्वयं जान सकेंगे कि यह धारणा विज्ञान संमत है या नहीं। हमें अधिक लिखने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।