कहा जा सकता है कि बिना इस पुस्तक को पढ़े भी मनुष्य प्रतिदिन मलत्याग करते ही हैं, और—मनुष्यों की बात छोड़ दीजिए, पशु-पक्षी भी बिना किसी रुकावट के इस प्राकृतिक आवश्यकता को पूरा कर लेते हैं फिर ऐसे घिनौने विषय पर व्यर्थ ही पृष्ठ काले करके समय का दुरुपयोग क्यों ? किन्तु वास्तव में ऐसा विचार करना भूल है। दैनिक-चर्या का जो सर्वाङ्गीण विधान शास्त्रकारों ने बतलाया है उसके ज्ञान के बिना की जाने वाली समस्त क्रियाएँ अधूरी रहती हैं और लाभप्रद सिद्ध होने की अपेक्षा हानिकारक सिद्ध होती हैं। इस विषय की ओर समुचित ध्यान न देने के कारण ही तीन चौथाई मनुष्य नाना प्रकार की शारीरिक और मानसिक व्यथाओं से पीड़ित रहते हैं। इसलिये यह आवश्यक है, कि ऐसे घिनौने किन्तु अनिवार्य और आवश्यक विषय पर भी चन्द पंक्तियें अवश्य लिखी जायँ।

प्रत्येक मनुष्य को दिन में दो बार शौच अवश्य जाना चाहिए। प्रातः भगवत्स्मरण के अनन्तर, शय्या से उठते ही शौच जाना चाहिए और सायंकाल करीब ४ या ५ बजे। आयुर्वेद शास्त्र की दृष्टि से हवादार खुले मैदानों में शौच जाना, जन-स्वास्थ्य के लिए अधिक लाभकारी है, क्योंकि इससे मल के विषाक्त कीटाणु शरीर में प्रविष्ट होकर हानि नहीं पहुँचा सकते और खुली वायु में श्वास लेने से शौच भी सुखपूर्वक होता है। इसके विपरीत शहरों में लोग प्रायः पाखानों में शौच जाते हैं जो कि तङ्ग और सीलदार कोठरियों में बने हुए होते हैं। घर के सभी पुरुष उसी गन्दे पाखाने में शौच जाने को बाध्य होते हैं, वहाँ हवा के साथ कीटाणु उड़ते रहते हैं जो श्वास के रास्ते भीतर जाकर मनुष्य के स्वास्थ्य को नष्ट कर डालते हैं। एक ही पाखाने में जाने वाले मनुष्यों की प्रकृति प्रायः भिन्न-भिन्न होती है, उनमें बहुत से रोगी हो सकते हैं। उनके रोग के कीटाणु दूसरे व्यक्तियों में संक्रामक रोगों को फैला देते हैं। इस दुरवस्था में आज सुधार की बड़ी आवश्यकता है। सफाई की ओर अधिक से अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए तभी देश के गिरते हुए स्वास्थ्य को सुधारा जा सकता है। सबसे प्रथम प्रयत्न तो यह होना चाहिए कि जो लोग शहर से बाहर शौचार्थ जा सकते हैं वे अवश्य बाहर ही जाया करें। शेष लोगों के लिए भी जो प्रबन्ध हो वह उत्तम होना चाहिए।

आप चाहे खुले मैदानों में शौच जायँ या पाखानों में, किन्तु इस विषय के स्वास्थ्यसम्मत कुछ शास्त्रीय नियमों का अवश्य ध्यान रखना चाहिए। आयुर्वेद में लिखा है—

शौचे च सुखमासीनः प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः।
शिरः प्रावृत्य कर्णौ च मुक्तकच्छशिखोऽपि वा॥

अर्थात्—मनुष्य को चाहिए कि मल त्याग के समय शिर तथा कानों पर वस्त्र लपेटकर, शिखा तथा वस्त्रग्रन्थी खोलकर पूर्व अथवा उत्तर दिशाभिमुख होकर सुखपूर्वक समभूमि में बैठे। इस श्लोक में तीन बातों की ओर विशेष बल दिया गया है। (१) शिर तथा कान वस्त्र से ढके हों, वस्त्रग्रन्थी तथा शिखा खुली हो। (२) पूर्व या उत्तर की ओर मुख हो। (३) सुखपूर्वक स्थिति। उपरोक्त तीन बातों का एक ही उद्देश्य है और वह है सुगमतापूर्वक मल-विसर्जन। शिर तथा कानों पर वस्त्र लपेट लेने से रक्त का दबाव ऊर्ध्वाभिमुख न रहकर अधोमुखी बन जाता है। शिर तथा कर्ण स्थानीय उन स्नायुवों में–जिनका सीधा सम्बन्ध मलाशय के साथ है–इस प्रकार की क्रिया द्वारा उष्णता और उत्तेजना उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव यह होता है कि मल बिलकुल साफ हो जाता है और कोष्ठबद्धता नहीं होती। आजकल के शास्त्रपराङ्मुख अपटुडेट जन्टिलमैन तथा अन्य शिक्षाशून्य मजदूर आदि, मलाशय में उष्णता तथा उत्तेजना पहुँचाने की गरज से घण्टों पाखानों में बैठे सिगरेट और बीड़ी के दम लगाया करते हैं, ऊपर से मुख का व्यापार तथा नीचे से गुदा का व्यापार चलाते २ भी बेचारों को कोष्ठबद्धता से पिंड नहीं छूट पाता। इधर कभी आप को लार्ड मैकाले के मानसपूत काले साहबों के यहाँ जाने का अवसर मिल जाये तो आप देखेंगे वे भी ........

"प्रातरुत्थाय मञ्चस्थो लालाक्लिन्नमुखः पुमान्।
'टीं' 'काफीं' 'बिस्कुटं' 'केकं' सेवयेन्नित्यमेव हि॥"

—टुडेस्मृति के इस आदेशानुसार गरम २ चाय पी कर मलाशय को हीट देते हुए शौच जाना पसन्द करते हैं। यह सब विचित्र लीला इस साधारण सी क्रिया को न जानने, तथा जान कर भी पुराने बनाम 'डर्टी' रिवाजों में परिगणित होने से त्याज्य समझने के कारण है।

पूर्व या उत्तराभिमुख व्यवस्था का भी अभिप्राय स्पष्ट है। प्रातःकाल और सायंकाल, प्रायः वायु का प्रवाह पूर्व या उत्तर से पश्चिम तथा दक्षिणाभिमुख रहता है, पूर्व एवं उत्तर की ओर मुख करके बैठने वाले व्यक्ति को मल के दूषित कीटाणुओं का श्वास के साथ शरीर में प्रविष्ट हो जाने का भय नहीं रहता और न इस से मल दुर्गन्धि का कष्ट ही सहन करना पड़ता है, क्योंकि सामने से आने वाला वायु दुर्गन्धी को पीछे से पीछे बहा ले जाता है। अनुकूल वायु के कारण श्वासक्रम भी सुगमता पूर्वक चलता है और मल विसर्जन में कोई कष्ट नहीं होता।

सुख पूर्वक स्थिति, शौच क्रिया में सब से आवश्यक है। शहरों में अधिक व्यक्ति इसलिये बीमार होते हैं और डाक्टरों की शरण लेते हैं कि उन्हें जिन पाखानों में जाना पड़ता है वे सुविधाजनक नहीं होते। सील तथा सड़ांद के कारण मनुष्यों का वहाँ बैठते ही दम घुटने लग जाता है और शंका पूरी हुए बिना ही उठ खड़े होते हैं, इसका परिणाम होता है—कब्जी (कोष्ठबद्धता) तथा पेट की अन्य बीमारियें। ऐसा करने से अवशिष्ट मल कड़ा होकर बड़ी अन्तड़ी के बाजुओं में चिपट जाता है। कुछ दिन यही क्रम जारी रहने पर मल निरन्तर चिपटता जाता है और मल द्वार छोटा पड़ जाता है जिससे मनुष्य को बवासीर, भगन्दर जैसे भयङ्कर रोगों का सामना करना पड़ता है। संसार में अधिकांश मृत्यु कब्ज के कारण ही होती हैं। लोग इसे मामूली बीमारी समझते हैं और देखने में यह है भी मामूली ही, परन्तु बड़े बड़े रोगों का मूल कारण होने के कारण, इसे सबसे भयङ्कर रोग कहा जा सकता है।

अमेरिका के सुप्रसिद्ध डाक्टर टर्नर ने अपने हस्पताल में मृत्यु को प्राप्त हुए २८४ मनुष्यों की मृत्यु का कारण बतलाते हुए लिखा है कि "उनमें से २८ मनुष्यों को छोड़कर बाकी सब कब्ज की बीमारी से मरे ! उनकी बड़ी अन्तड़ियाँ फाड़कर देखी गईं तो मालूम हुआ कि वे पत्थर की तरह कठिन हो गई हैं और उनमें सूखा काला मल भरा हुआ है।"

तात्पर्य यह है कि प्रत्येक समझदार व्यक्ति को ऐसा कोई कारण उपस्थित न होने देना चाहिये जिससे कि उसे कोष्ठबद्धता जैसे भयङ्कर रोग का शिकार बनना पड़े। 'शौचे च सुखमासीनः' भी अनुभवी महर्षियों द्वारा इसी रोग के विरुद्ध बतलाया गया एक उपाय है जिस पर पूरा ध्यान न दे सकने के कारण लोग कष्ट भोगते हैं।