शौच लघुशंका आदि के समय मौन, एक सनातनी प्रथा मात्र नहीं किन्तु धर्मशास्त्रानुमोदित एवं विज्ञान समर्थित शिष्टाचार है। प्रायः अशिक्षित, या उच्चशिक्षित होते हुए भी भारतीय संस्कारों से शून्य व्यक्तियों में इस शिष्टाचार की भी अवहेलना देखी जाती है। लघुशङ्का करते-करते बातें करना, शौच बैठे-बैठे अखबार पढ़ना तो नई पीढ़ी के बड़े लोगों के फैशन की चीज है लेकिन दूसरे अशिक्षित व्यक्ति भी बैठे २ खाँसना, थूकना आदि क्रियाएँ करते रहते हैं। यह सब आदतें जहाँ शिष्टजन विगर्हित हैं वहाँ स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा प्रभाव डालती हैं।

यह स्वाभाविक बात है कि जब हमारा शरीरस्थ वायु 'अपान' रूप धारण करके मलाशय तथा गुदा के शोधन कार्य में लगा हुआ होता है उस समय उसका 'प्राण, समान, उदान' आदि रूपों में किया जाने वाला व्यापार मन्द पड़ जाता है। हमारा कर्तव्य है कि उस समय शान्त बैठे रहकर उस वायु को अपना कार्य करने में सहायता दें। इसके विपरीत, उस समय यदि हम किसी अन्य व्यापार में लगेंगे तो परिणाम यह होगा कि वह शोधन कार्य तो मन्द पड़ जाएगा और वायु की शक्ति अन्य रूपों में विभक्त हो जाएगी। बोलने, खाँसने, हाँपने आदि से मल के दूषित कीटाणु तो अन्दर प्रविष्ट होंगे ही साथ ही मलाशय शोधन के प्राकृतिक काम में अड़चन भी पड़ जाएगी जो स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। इसलिए धर्मशास्त्रकारों ने कहा है—

उच्चारे मैथुने चैव प्रस्रावे दन्तधावने।
श्राद्धे भोजनकाले च षट्सु मौनं समाचरेत्॥

अर्थात्—मूत्र पुरीषोत्सर्ग काल में, मैथुन में, रक्तादि के प्रस्राव में, दातुन करते समय, श्राद्धकाल में और भोजन के समय मौनावलम्बन करना चाहिए। इस श्लोक में वर्जित सभी समयों में मौन का जो महत्त्व है उसे तत्तत् स्थलों पर बतलाया जाएगा। यहाँ तो इतना ही समझ लेना चाहिए कि शौच और लघुशंकादि के समय अवश्य ही मौन रक्खा जाय।