औदुम्बरेण दन्तान् धावेत्। (पारस्कर गृह्यसूत्र)

अर्थात्—गूलर की दातुन से दाँतों को स्वच्छ करना चाहिए।

दन्त धावन हमारी दैनिक चर्या का अंग है। प्रतिदिन प्रातःकाल शास्त्रोक्त वनस्पतियों में से किसी भी वनस्पति की हरी ताजी दातुन से दाँतों को स्वच्छ तथा निर्मल बनाना प्रत्येक स्वास्थ्याभिलाषी पुरुष का आवश्यक कर्तव्य है। सभी लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, कि दाँतों का शरीर में विशेष महत्त्व है। जिस आहार से प्राणमात्र के शरीर की रचना तथा पोषण होता है उसको पीसकर आमाशय के योग्य बनाना दाँतों का ही कार्य है। चूँकि मनुष्य के लिये, आहार की आवश्यकता जीवन के अन्तिम क्षण तक है, इसलिए दाँतों की आवश्यकता भी उस क्षण तक समझनी चाहिए। इस दृष्टि से यदि इन्हें जीवन का आधार कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं। शरीर रूपी दुर्ग के मुख्य द्वार के यह सचेत प्रहरी यदि जरा भी असावधानी करें तो मनुष्य जीवन किसी भी क्षण घोर संकट में पड़ सकता है। इन्हीं विश्वस्त प्रहरियों के भरोसे मनुष्य कच्ची पक्की, सूखी हरी, नम कठोर, खाद्य अखाद्य सभी प्रकार की वस्तुएँ खा बैठता है और यह उनको पीसकर जीवनोपयोगी बना डालते हैं।

दाँतों के इस सब महत्त्व से परिचित होते हुए भी आज, जनसाधारण इनकी रक्षा और पोषण के लिए कितना प्रयत्न करते हैं इसका दिग्दर्शन—२० वर्ष की अवस्था में ही डेंटिस्टों की शरण लेकर नए दाँत चढ़वाने वाले आधुनिक युवकों को देखकर भली-भाँति किया जा सकता है। पहिले जहाँ अस्सी-नब्बे वर्ष के बूढ़े दाँतों से चने चबा लिया करते थे, वहाँ आज बीस-तीस वर्ष की अवस्था में ही दाँतों में पायोरिया की बीमारियें लग जाती हैं। दाँतों से खून आने लग जाता है और देखने में अच्छे-भले नवयुवक, दाँतों की खराबी के कारण अन्य अनेक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। बहुत थोड़े लोग इस बात को समझते हैं कि दाँतों के खराब हो जाने का तात्पर्य है—मृत्यु की ओर एक कदम ! क्योंकि दाँतों के गिर जाने के बाद फिर मनुष्य का आहार बिना चबाया या कम चबाया ही पेट में पहुँचता है, जिसे रसरूप में परिणत करने के लिये आमाशय को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है। परिणाम यह होता है कि कुछ दिनों बाद उसकी शक्ति मन्द पड़ जाती है और मनुष्य रोगी बन जाता है।

दाँतों को बलिष्ठ और अच्छी दशा में रखना कुछ कठिन नहीं है। शास्त्रीय आदेशानुसार यदि हम प्रतिदिन नियत समय पर दन्तधावन करें तो १०० वर्ष तक भी दाँतों के हिलने या गिरने का कोई सवाल ही पैदा न हो, लेकिन शर्त यही है कि वह दन्तधावन क्रिया की जाय शास्त्रीय पद्धति से ही। आज की मनमानी विधि से नहीं, कि प्रातः बाहर टहलने निकले, वहीं से दातुन तोड़ी और करते-२ घर का रास्ता पकड़ा। रास्ते में यार दोस्तों से गप्पें भी चल रही हैं, दातुन भी हो रही है और टहलना भी ! एक पथ तीन काज !! तीन काज के बजाय यहाँ चार काज कहदें तो ज्यादा अच्छा रहे, क्योंकि दातुन करते समय दाँतों से उतरने वाला मल, पानी के कुल्ले के अभाव में बातों के स्वाद के साथ धीरे-२ पेट में भी तो उतरता जाता है, जो वहाँ जाकर पुनः फुन्सी फोड़े, खुजली दाद वगैरह के सुन्दर सलोने रूप में बाहर आकर दर्शन देता है, या पेट में कीड़े उत्पन्न करके भले चंगे स्वस्थ व्यक्ति को चारपाई का आश्रय लेने को विवश कर देता है।

दुर्भाग्य से हमारे देश में एक दल और है जो दाँतोंकी सफाई का महत्त्व तो खूब समझता है किन्तु उसके मत से इस कार्य के लिये उपयुक्त समय प्रातःकाल नहीं, किन्तु भोजनानन्तर मध्याह्नकाल है। भोजनोपरान्त दातुन करना शायद इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, कि उस समय जीभ की सफाई, हलकौवा आदि करने से सब खाया पीया वमन होकर दाँतों के साथ-२ पेट की भी सफाई हो जाती है ! या बार बार थूकने से अग्निमांद्य होकर इस असार संसार से जल्दी ही विदा हो जाने में सहायता मिलती है ! इस प्रकार की सभी चेष्टायें लाभकारक तो कदापि सिद्ध नहीं होतीं यह निर्विवाद है। इसलिये ऊपर कहा गया है कि दन्तधावन क्रिया, तभी वास्तविक लाभकारी हो सकती है जबकि इसका आचरण शास्त्रीय विधि से हो। 'वह कब की जाय कब नहीं, कैसे की जाय ? दातुन किस वृक्ष की हो ?' इत्यादि बातों को जाने बिना हम यदि उसका प्रयोग भी करते हैं तो उससे लाभ के स्थान पर हानि की अधिक सम्भावना रखनी चाहिये।


दातुन का प्रयोग केवल दाँतों की सफाई के लिये ही होता हो ऐसी बात नहीं है। आयुर्वेद प्रणेता चरक एवं सुश्रुत आदि महर्षियों ने दाँतों की सफाई के साथ-२ दातुन का प्रयोग चिकित्सा पद्धति के तौर पर अनेक रोगों की निवृत्ति के लिये भी किया है। आज जब हम उन क्रान्तदर्शी महर्षियों द्वारा निर्दिष्ट प्रयोगों की शत प्रतिशत सफलता देखते हैं तो आश्चर्यचकित रह जाते हैं। उदाहरणतया पाठकों के दिग्दर्शनार्थ हम आयुर्वेदोक्त कुछ प्रयोगों का निदर्शन नीचे कराते हैं जिससे सभी सज्जन यथेष्ट लाभ उठा सकते हैं यथा—

(क) बदर्यां मधुरः स्वरः। (ख) उदुम्बरे च वाक्सिद्धिः।
(ग) अपामार्गे स्मृतिर्मेधा। (घ) निम्बश्च तिलके श्रेष्ठः।

अर्थात्—(क) यदि दाँतों की सफाई के साथ गले में माधुर्य भी लाना हो तो बेर की दातुन करनी चाहिए। (ख) यदि जीभ लड़खड़ाती हो—हकलापन हो तो नियमपूर्वक गूलर की दातुन करने से वह रोग दूर होकर वाणी सिद्ध (ठीक) हो सकती है। (ग) स्मरण शक्ति की निर्बलता या बुद्धिमांद्य के लिए अपामार्ग की दातुन का प्रयोग अत्यन्त लाभप्रद है। (घ) मुख की दुर्गन्ध दूर करने के लिये—पायोरिया जैसे रोगों में नीब की दातुन श्रेष्ठ है।