नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद्देवर्षिपितृतर्पणम् (मनु)
अर्थात्—प्रतिदिन प्रातः स्नान करके शुचि होकर सन्ध्या वन्दन तथा देवर्षि तर्पणादि नित्य कर्म करे।
हिन्दू जाति के सभी धार्मिक तथा सामाजिक कृत्यों में 'स्नान' एक अनिवार्य और आवश्यक कृत्य है। सन्ध्या वन्दनादि साधारण दैनिक कृत्यों से लेकर बड़े से बड़े अश्वमेध यज्ञ पर्यन्त सभी कर्मों का प्रारम्भ स्नान से ही होता है। यही क्यों, एक हिन्दू के जीवन का प्रारम्भ भी स्नान ही से होता है और पर्यवसान भी स्नान में ही। बालक, जन्म लेकर ज्योंही जीवन रक्षा के लिए आकुल वाणी में पुकारना आरम्भ करता है—चिरबन्धन से विमुक्त हो ज्योंही वह मुक्तवायु में प्रथम उच्छ्वास ग्रहण करता है, तभी कुशल धात्री सर्व प्रथम उसके शरीर को स्वच्छ करके स्नान कराती है। इसी प्रकार जीवन के पर्यवसान में, जब कि उसकी आत्मा शरीर को छोड़कर अनन्त में लीन हो जाती है, तब भी हिन्दू के शरीर को चितारोहण से पूर्व एक बार पुनः स्नान कराया जाता है और अन्त में जब सब कुछ 'भस्मान्तꣳ शरीरम्' बन जाता है उस समय उस भस्म में से चुनी हुई हिन्दू की वह अस्थियें भी पतित पावनी जाह्नवी में अनन्त स्नान के लिए विसर्जित की जाती हैं। इससे अधिक स्नान का महत्त्व किस देश और किस जाति में देखने को मिल सकता है ? हिन्दुओं के हरिद्वार काशी प्रयाग कुरुक्षेत्र उज्जैन पुष्कर आदि सभी तीर्थस्थानों की महिमा स्नान पर ही निर्भर है। इन स्थानों पर बिना किसी विशेष प्रोपेगण्डे के तत्तत् समय में स्नान के लिए उमड़ पड़ने वाले जन-समुद्र को देखकर हिन्दुओं की स्नानप्रियता का अनुमान करना कुछ कठिन नहीं है।
वेदादि शास्त्रों में स्नान गरिमा के सूक्त के सूक्त भरे पड़े हैं।
गंगे ! त्वद्दर्शनान्मुक्तिर्न जाने स्नानजं फलम्।
—आदि अनेक शास्त्रीय वचनों में स्नान का अवर्णनीय महत्त्व प्रतिपादित किया है। उसके आगे मुक्ति जैसा पदार्थ भी अत्यन्त तुच्छ माना गया है। यह स्नान (अभिषेक) ही है जो कलके एक सामान्य जन को दूसरे दिन सार्वभौम सम्राट् के महान् पद पर प्रतिष्ठित कर देता है।
स्नान क्रिया का तात्पर्य शारीरिक शुद्धि से है। 'ष्णा शौचे' धातु से निष्पन्न होने वाले इस शब्द का अर्थ ही शुचिता सम्पादन है। हम पीछे बतला आये हैं कि हमारी त्वचा में असंख्य छोटे-२ रन्ध्र होते हैं। इन्हीं छिद्रों से भीतर का मल स्वेद के रूप में बाहर निकला करता है। वायु के लगने से पसीने का द्रव भाग तो वाष्प बनकर उड़ जाता है, किन्तु अद्रव मैल इन रन्ध्रों में जम जाता है। यदि इस मल को रोज साफ न किया जाय तो कुछ दिनों बाद मैल की मोटी तह इकट्ठी होकर इन रन्ध्रों को बिलकुल बन्द कर देगी जिससे अन्दर का मल और दूषित वायु बाहर न आकर अन्दर ही अन्दर सड़ जाएगी। शरीर से दुर्गन्धी आने लगेगी, अनेक प्रकार के रोग पैदा होंगे और जीवन दूभर हो जायेगा। इसलिए प्रतिदिन स्नान करके त्वचा को बिलकुल स्वच्छ कर लेना चाहिए। इस मल की सफाई ही स्नान का प्रथम उद्देश्य है।
स्नान का दूसरा उद्देश्य शरीर में अपेक्षित जलीय अंश की पूर्ति और प्राण शक्ति का संतर्पण है। आप जानते ही हैं, कि हमारे इस शरीरका निर्माण पृथ्वी अप तेज आदि पञ्च महाभूतों से हुआ है और उन्हीं के द्वारा यह जीवित भी है। हमारे शरीर में प्रत्येक भूतांश क्षण-२ में क्षीण होता रहता है, जिसकी पूर्ति हम प्रकृति मण्डल में विस्तृत पञ्च महाभूतों से भोजन, जल, वायु आदि को ग्रहण करके करते रहते हैं। जब हमारे शरीर में विद्यमान जल, शारीरिक ऊष्मा से सूख जाता है, तो शरीर में बेचैनी अनुभव होने लगती है। आमाशय और उसके समीपवर्ती प्रदेश में उत्पन्न होने वाले ताप को तो जल पीकर शांत कर लिया जाता है, किन्तु शरीर के रोम-२ से फूट पड़ने वाली जलाभावजन्य ऊष्मा को शान्त करने के लिए तो स्नान के अतिरिक्त चारा ही कुछ नहीं। गर्मी के दिनों में पाठकों ने इसे भली प्रकार अनुभव किया होगा, जबकि मनुष्य ग्रीष्म से संतप्त होकर जल की शरण में शांति अनुभव करते हैं।
जल के कण-२ में प्राणशक्ति निहित है। श्रुति में—
आपो वै प्राणाः
—कहकर उसे प्राणशक्ति का नैसर्गिक स्रोत स्वीकार किया है। स्नान से हमारे प्राणों की तृप्ति होती है। शरीर में स्फूर्ति तथा चैतन्यता का उदय हो जाता है। आलस्य पास नहीं रहता और मन प्रफुल्लित हो जाता है।
पश्चिमी देशों में तो जल के महत्त्व का पता लोगों को अब इतने दिन बाद लगा है और वे उसकी आरोग्यता विधायिनी शक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गये हैं, किन्तु तपोपूत महर्षियों ने लाखों वर्ष पूर्व जल की इस अमित शक्ति का अनुभव करके ही उसे देवत्व के पद पर अभिषिक्त किया था। प्रत्येक कार्य के आरम्भ में जल स्नान, जल आचमन और जल पूजन की प्रणाली प्रचलित करके उन्होंने इसे धार्मिक परम्परा का अविच्छिन्न अंग ही बना दिया जिससे सर्व साधारण में स्नान आदि के प्रति पर्याप्त रुचि उत्पन्न हो।
नदी सरोवर या किसी बहते हुए पानी में स्नान करना सर्वोत्तम कहा जा सकता है। इसलिये सनातन धर्म में गंगा यमुना गोदावरी आदि नदियों का महत्त्व पूर्ण स्थान है। स्नान के लिये यह आवश्यक है, कि शरीर का प्रत्येक भाग अच्छी तरह आर्द्र हो जाए। नदी तालाब में यह सर्वथा सुसम्भव है। वहाँ शरीर के मल और दूषित वायु से गन्दा हुआ जल अति शीघ्र बह जाता है और उसकी जगह लाखों गैलन ताजा जल फिर उपस्थित हो जाता है। इसलिये जहाँ तक सम्भव हो बहते हुए पानी में स्नान करना चाहिये।
शहरों में जहाँ नदी तालाब आदि का प्रबन्ध नहीं है, या श्रमसाध्य है, वहाँ नलगंगा या कूए की ही शरण लेनी पड़ती है। ऐसे स्थान पर अधिकांश व्यक्ति जल्दी में दो चार लोटे डालकर हस्ती-स्नान करके इस आवश्यक कृत्य को निबटा देते हैं। ऐसे स्नान से वस्तुतः कोई लाभ नहीं। धर्म की दृष्टि से प्रतिदिन स्नान करने वाले हमारे आस्तिक समाज को यह बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिये कि स्नान स्वतः कोई धर्म नहीं है, किन्तु धर्मसाधनभूत इस देह को धर्माचरणक्षम रखने के कारण ही वह धार्मिक कृत्य है। यदि आप स्नान का वास्तविक तात्पर्य समझे बिना दो चार लोटे डालकर अपना कर्तव्य तो पूरा कर लेते हैं, किन्तु फिर भी आपका शरीर रोगी ही रहता है, तो इसके कारण दयालु ईश्वर को दोष देने की आवश्यकता नहीं। मन में कभी यह विचार न कीजिये, कि उसने आपके जैसे नित्यस्नायी भक्त को उसकी भक्ति का कितना अच्छा (?) पुरस्कार दिया है। ऐसा विचार आपकी भ्रान्ति है। कमी तो आपके कर्तव्य में है। आपने यह समझा ही नहीं कि स्नान का तात्पर्य क्या है और वह कैसे किया जाता है ?
स्नान चाहे कूए पर किया जाय या नल पर, इसी विधि से करना चाहिये। स्नान के समय शरीर पर साधारण वस्त्र होना चाहिये, एक लङ्गोट और अङ्गोछा काफी है। उसे लपेट कर जाइये। पास में एक लोटा और पानी से भरी बाल्टी रख लीजिए। लोटे में जल लेकर सर्वप्रथम शिर को भिगोइये, इसके अनन्तर हाथ और पाँव धोने चाहिये। प्रथम शिर का भिगोना इसलिये आवश्यक है, कि शिर में जल पड़ने पर वहाँ बढ़ी हुई गर्मी पाँवों के रास्ते निकलकर शान्त हो जाती है। यदि ऐसा न करके पहिले पाँव भिगोये जांय तो पाँवों की गर्मी शिर में समा जाती है, जिससे कुछ दिनों में मस्तिष्क में विकार उत्पन्न होकर पागलपन शुरू हो जाता है। अस्तु,
शिर, हाथ, पाँव धोने के उपरान्त पानी डाल-२ कर शरीर को अच्छी तरह भिगो डालिये और उसे खद्दर के अंगोछे या खुरदरे तोलिये से मलना शुरू कीजिए। लगभग दश पन्द्रह मिनट शरीर को इसी प्रकार मलना चाहिये जिससे रन्ध्रों में घुसा हुआ मल फूल कर बिलकुल साफ हो जाय। इसके बाद ५ मिनट तक शरीर पर बराबर पानी डालते रहिये। यह पानी इन रोमों के रास्ते अन्दर जाकर अपेक्षित जलीय अंश की पूर्ति कर देगा। अन्त में शरीर को तौलिये से पोंछ डालिये और वस्त्र पहन लीजिये। यह आपका स्नान हो गया।
यह स्नान का निरा लौकिकस्वरूप है। इसके आध्यात्मिक रूप में कुछ भावनाओं का सन्निवेश और होता है। शास्त्रीय विधि के अनुसार हमें स्नान से पूर्व जल की अधिष्ठात्री शक्ति 'वरुण' की अभ्यर्थना करनी चाहिये। इस उपासना का रहस्य हम विगत अध्याय के 'देवतावाद' में प्रतिपादित कर आये हैं। स्नान समय पठनीय सभी धर्मशास्त्रोक्त मन्त्रों में जल की दिव्य शक्ति का वर्णन करके लोगों को उससे पूरा-२ लाभ उठाने की शिक्षा का ही प्राधान्य है। स्नान करते हुए आस्तिक पुरुषों के मुख से—
गंगे ! च यमुने ! चैव गोदावरि ! सरस्वति !
नर्मदे ! सिन्धु ! कावेरि !, जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
यह श्लोक प्रायः सभी ने सुना होगा। गंगा गोदावरी से हजारों वर्ग मील दूर साधारण तालाब में स्नान करते हुए भी एक सनातनधर्मी प्रतिदिन स्नान के समय, शरीर से नहीं तो कम से कम मन से ही अपने भावना साम्राज्य में कैसे गंगा गोदावरी का पवित्र सान्निध्य प्राप्त कर लेता है और इनके प्रति अपनी श्रद्धा के पुष्प चढ़ाता है—यह बात इस श्लोक को देखकर भली प्रकार जानी जा सकती है। स्नान के समय सर्वदा किसी स्तोत्र का पाठ करना चाहिये। स्तोत्र चाहे किसी भी देवी देवता का हो यह आपकी श्रद्धा पर निर्भर है। स्तोत्र पाठ इसलिये आवश्यक है कि जल का स्पर्श पाते ही वाणी अपने आप प्रस्फुटित हो उठती है। और उस समय फिर जो भी कुछ जबान पर आजाय मनुष्य वही बोलने लगता है।
हमने देहात में अपनी भोली भाली अपठित माताओं को देखा है। वे श्रद्धा परिपूत हृदय से जब स्नान करने लगती हैं तो और कुछ नहीं तो—'बिल्ली के बच्चे बचाए, द्रौपदी की लाज रखी'—यह दोनों वाक्य ही उनके लिये स्तोत्र रूप बन जाते हैं। यहाँ तक तो गनीमत है कि इन देवियों के पास कम से कम श्रद्धा परिपूत हृदय तो है। ये देहाती देवियें मेरे उन पड़ोसी बाबुओं से तो हजार दर्जे अच्छी हैं जो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के समय जल का स्पर्श पाते ही तार स्वर से—
'या इलाही मिट न जाए दर्दे गम'
—फिल्मी धुन की ही निरन्तर रट लगाते चले जाते हैं। अस्तु, तात्पर्य यह है कि भगवन्नामात्मक संस्कृत या हिन्दी के कुछ पद्य स्तोत्र रूप में कण्ठस्थ अवश्य कर लेने चाहिये और स्नान के समय उन्हें बोलते रहना चाहिए इससे शारीरिक शुद्धि के साथ मन और वाणी की भी शुद्धि हो जाएगी।
यद्यपि आज का सभ्य शिक्षित समुदाय तो, स्नान की कौन कहे, शौच जाने से पूर्व ही बिस्तर पर पड़े-२ चाय केक का भोग लगाकर प्राकृतिक नियमों की प्रत्यक्ष अवहेलना कर रहा है और विविध रोगों के रूप में उसका दुष्परिणाम भी भोग रहा है, किन्तु हमारे यहाँ किसी समय अनुल्लंघनीय नियम था, कि बिना स्नान किये कुछ न खाया जाय। इस नियम के धार्मिक पहलू को एक तरफ रख इसके शारीरिक विज्ञान सम्मत पहलू पर ही इन पंक्तियों में कुछ लिखेंगे।
हम पीछे बतला चुके हैं कि स्नान द्वारा शरीर के प्रत्येक भाग को नया रस और नया जीवन प्राप्त होता है। शरीर में पिछले २४ घण्टे में इकट्ठा हुआ सभी प्रकार का मल, स्नान और उससे पूर्ववर्ती क्रियाओं द्वारा साफ हो जाता है और उसमें सभी विषयों को ग्रहण करने की एक नई योग्यता आजाती है। यह प्रभाव अन्य अंगों के साथ मनुष्य के पाचक यन्त्रों पर भी पड़ता है, जिससे उनमें भी अन्न ग्रहण की नई इच्छा जागृत होती है, इसी का नाम भूख है। यह इच्छा स्नान करने से जितने तीव्र रूप में जागृत होती है उतनी और किसी तरह नहीं। अतएव स्नान करके जब स्वाभाविक क्षुधा अच्छीतरह जागृत हो जाय तभी भोजन करना चाहिए। स्नान से पूर्व खाने में न वह अभिरुचि न आनन्द। मनुष्य खा अवश्य लेता है और अग्नि उसे पचाती भी है, किन्तु ऐसे भोजन से बना हुआ प्रभावहीन रस शरीर के लिए पूर्ण लाभकारी नहीं होता।
इसके अतिरिक्त स्नान से पूर्व, जब हम कोई वस्तु खा लेते हैं, तो जाठराग्नि उसे पचाने के कार्य में लग जाती है। उसके बाद यदि आप स्नान करने लग जायें तो शरीर के शीतल हो जाने के कारण उदर में नानाविध रोग उत्पन्न होंगे और शरीर को कष्ट भोगना पड़ेगा। इसलिए प्राचीन आचार्यों ने यह व्यवस्था की है, कि बिना स्नान कुछ खाया न जाय।
कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर स्नान से पूर्व भी खा लेना हानिकारक नहीं और न दोषावह ही, ऐसी वस्तुओं की गणना करते हुए स्मृतिकारों ने लिखा है—
इक्षुरापः पयोमूलं फलं ताम्बूलमौषधम्।
भुक्त्वा पीत्वापि कर्तव्या स्नानदानादिकाः क्रियाः॥
अर्थात्—गन्ने का रस, पानी, दूध, फल, मूल, पान और दवाई इन चीजों को खा पीकर भी स्नान दानादि क्रिया की जा सकती है। इस श्लोक में प्रतिपादित सभी वस्तुएँ अल्पकाल में ही पचने योग्य और जल प्राचुर्य से परिपूर्ण होने के कारण ही स्नान से पूर्व ग्रहण की जाने पर भी स्नान विघातक नहीं होती।