प्रत्येक धार्मिक कार्य के अनुष्ठान में कर्ता के लिए अमुक २ आसन पर बैठना भी, शास्त्र में आवश्यक माना गया है। यथा-
शास्त्रीय-स्वरूप
(क) कृष्णाजिनमखण्डम्। (दयानन्दीय सं० विधि पृष्ठ १९)
(ख) आसीनासो अरुणीनामुपस्थे। (अथर्व १८।३।४३)
(ग) शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ६।११)
(घ) काम्यार्थं कम्बलं चैव श्रेष्ठं च रक्तकम्बलम्।
कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिर्मोक्षश्रीर्व्याघ्रचर्म्मणि।
कुशासने मन्त्रसिद्धिर्नात्रकार्य्या विचारणा॥
(ङ) धरण्यां दुःखसम्भूतिर्दौर्भाग्यं दारुजासने।
वंशासने दरिद्रः स्यात् पाषाणे व्याधिपीडनम्॥
तृणासने यशोहानिः पल्लवे चित्तविभ्रमः।
जपध्यानतपोहानिं वस्त्रासनं करोति हि॥
(ब्रह्माण्ड-पुराणे तन्त्रसारे च)
(च) भूमौ दर्भासने रम्ये सर्वदोषविवर्जिते।
(अमृतनादोपनिषद् १८)
अर्थात्-(क) अखण्डित काला मृगचर्म्म [बिछाना चाहिए।] (ख) ऊर्णा निर्म्मित आसन पर बैठे हुए (ग) पवित्र स्थान में स्थिर आसन जमाना चाहिये, जो न अधिक ऊँचा हो, न अधिक नीचा हो, और रेशमी, मृगचर्म्म और कुशासन उत्तरोत्तर बिछाये जाएँ। (घ) काम्यकर्म्म में कम्बल का आसन—वह भी लाल हो तो श्रेष्ठ है। काले मृगचर्म पर ज्ञान सिद्धि प्राप्त होती है। व्याघ्रचर्म पर मोक्ष श्री प्राप्त होती है। कुशासन पर सब मन्त्रों की सिद्धि प्राप्त होती है इसमें कुछ भी सन्देह की आवश्यकता नहीं। (ङ) खाली भूमि पर निरासन बैठने से दुःख, लकड़ी के आसन पर दौर्भाग्य, बाँस के आसन पर दरिद्रता, पत्थर पर बैठने से रोग, घास-फूँस के आसन से अपयश, पत्तों के आसन से चित्त में भ्रम और कपड़े के आसन से जाप ध्यान तथा तप की हानि होती है। (च) भूमि में दर्भ का आसन बिछाकर धर्म्मानुष्ठान करना सब दोष रहित है।
अन्यत्र ऐसे भी अनेक प्रमाण उपलब्ध होते हैं, कि जिनमें आसन के बिना अमुक धार्मिक अनुष्ठान करना सर्वथा निषिद्ध किया गया है। मुसलमानों की नमाजी चटाई और ईसाइयों की प्रार्थना कुर्सी तो सभी जानते हैं, अन्यान्य पन्थवालों में भी कुछ न कुछ बिछाने की परिपाटी पाई जाती है।
वैज्ञानिक विवेचन
आसन, केवल कपड़े मैले होने से बचाने मात्र के लिये ही बिछाया जाता है—अहिन्दू लोगों में यह धारणा भले ही बद्धमूल हो, परन्तु हिन्दू लोग तो इस कृत्य को भी धार्मिक अनुष्ठान का अनिवार्य अङ्ग समझते हैं, क्योंकि शास्त्र में—'अमुक तरह का आसन होना चाहिए और अमुक तरह का नहीं-ऐसी व्यवस्था देखने में आती है, तथा आसन के न होने पर कर्मविघात का भी उल्लेख मिलता है, सो यह विधान सुस्पष्ट आसन की धार्मिकता को सिद्ध करता है। अस्तु,
धार्मिक कृत्यों में आसन क्यों बिछाया जाता है। इसलिये कि पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण के अनुसार समस्त पार्थिव पदार्थों को अपनी ओर खींचती है, इसी कारण से ऊपर से गिरी प्रत्येक वस्तु धम्मसे पृथ्वी पर आ पड़ती है। कहा जाता है पाश्चात्य वैज्ञानिक न्यूटन ने ईसा की चौदहवीं शताब्दी में, एक सेव वृक्ष से टूटकर नीचे गिरता देखा तो उसे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का ज्ञान हुआ, परन्तु भारतीय ऋषि तो अरबों वर्षों से इससे परिचित थे—यह बात हमारी आसन व्यवस्था से भली भाँति सिद्ध होती है। हाँ, तो पृथ्वी में रहने वाला आकर्षण भजन पूजा पाठ आदि धार्मिक अनुष्ठान करते हुए मनुष्य को प्रभावित न कर सके, एतदर्थ पृथ्वी और अनुष्ठाता दोनों के मध्य में ऐसे पदार्थों का होना आवश्यक है, जो कि पार्थिव विद्युत् के संक्रमण को मानव पिण्ड की विद्युत् के साथ संयुक्त न होने दे।
बड़े २ नगरों में जहाँ बिजली का प्रबन्ध होता है वहाँ सभी ने कई बार यह देखा या सुना होगा, कि अमुक व्यक्ति बिजली का तार छूने से मर गया। निःसन्देह यदि कोई व्यक्ति बिजली के खुले तार को पकड़ ले तो वह मृत्यु का ग्रास बन जाता है, परन्तु बिजली को फिट करने वाले व्यक्ति रात दिन उन तारों को छूते हैं तब भी उनका बाल बाँका नहीं होता। क्या आप जानते हैं इसका कारण क्या है ? कारण यह है, कि संसार में दो प्रकार के पदार्थ होते हैं, एक वे जिनमें विद्युत् प्रवाह प्रवेश कर जाता है। जैसे—लोहा, पीतल आदि धातुएँ और जल मनुष्य पशु पक्षी आदि जीव। दूसरे ऐसे हैं जिन पर विद्युत् का कुछ भी प्रभाव नहीं होता, जैसे लकड़ी चीनी, मिट्टी, रबड़ आदि २ वस्तुएँ। जिन पदार्थों में विद्युत् प्रवाह संक्रान्त नहीं होता उन पहली श्रेणी के पदार्थों को वैदिक विज्ञान में अशुचि, और दूसरी श्रेणी के पदार्थों को 'शुचि' कहते हैं। पाश्चात्य भाषा में उन्हें कन्डैक्टर=संक्रामक और नान कन्डैक्टर=असंक्रामक कहा जाता है।
सो, यदि लकड़ी आदि 'शुचि' पदार्थों पर खड़े होकर कोई बिजली के तार को छूए तो उसको कुछ भी हानि नहीं हो सकती। इसके विपरीत यदि पृथ्वी आदि 'अशुचि' वस्तुओं पर खड़ा कोई मनुष्य बिजली से छू जाए तो बिजली का करन्ट मानवपिण्ड में प्रविष्ट होकर पृथ्वी पिण्ड में प्रवाहित होने लगेगा। इस तरह 'पावरहाऊस' और पृथ्वी के बीच में मानव पिण्ड माध्यम की दशा में आजाएगा, जिससे मानव पिण्ड का रक्त प्रवाह बिजली के करन्ट से प्रभावित होकर आवश्यकता से अधिक उद्वेलित हो जाएगा। जहाँ एक सौ छः डिगरी से अधिक मानव पिण्ड का तापमान हुआ कि वह मरा। परन्तु लकड़ी पर खड़े होकर तार छूने की दशा में विद्युत्प्रवाह मानव पिण्ड में प्रवेश करके लकड़ी के असंक्रामक होने के कारण पृथ्वी पिण्ड में नहीं जा पाता—किन्तु वापिस लौट जाता है, इसलिए मानवपिण्ड पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता।
इसी वैज्ञानिक हेतु से भारतीय ऋषियों ने पूजा-पाठ के समय गोबर का चौका, काठ का पटड़ा, कुशाका आसन, मृगचर्म, और अमुक २ अनुष्ठान में सिंह व्याघ्र के चर्म, ऊर्णानिर्मित आसन आदि जितने भी आसन बताए हैं, वे सब ही आज की भाषा में संक्रमणशून्य=नान कन्डैक्टर कहे जा सकते हैं। इस प्रकार पार्थिव विद्युत्प्रवाह अनुष्ठाता पुरुष के पाँवों के मार्ग से उसके पिण्ड पर कुछ भी प्रभाव न डाल सके, यही आसनों का वैज्ञानिक महत्व है।
बिजली के तारों को मिट्टी के बने आधार बोटों पर बाँधना, या लकड़ी की फट्टियों के सम्पुटों में बन्द रखना, किंवा रबड़ के खोल में लपेटना इसी आशय से अनिवार्य है, कि ये पदार्थ नानकन्डैक्टर होने के कारण विद्युत् करन्ट को लोहे के स्तम्भों में, मकान की दीवारों में प्रविष्ट नहीं होने देते।
(शास्त्रीय स्वरूप और विज्ञान)
मृगचर्म के आसन की पवित्रता का वर्णन वेद संहिता भाग में आता है। वेद में लिखा है कि—
कृष्णाजिनं वै सुकृतस्य योनिः। (यजुर्वेद)
अर्थात्—काला मृग चर्म सब पुण्यों का जनक है। 'वस्तु वैचित्र्यवाद' के अनुसार स्वभावतः ही मृगचर्म शुचि पदार्थों में अन्यतम है। हम 'शुचि अशुचिवाद' में भी इसकी चर्चा कर आये हैं। मृगचर्म में ऐसी विद्युत् पाई जाती है कि जिसके सम्पर्क से बैठने वाले की कामेन्द्रिय शान्त रहती है। इस लिये सत्त्व गुण का उपार्जन करने वाले ब्रह्मचारी योगी यति और महात्मा लोग इस पर बैठते हैं। साथ ही यह प्रत्यक्ष देखने में आता है, कि अधिक बैठने वाले सेठ साहूकार और मुनीम, अर्श, भगन्दर कोष्ठबद्धता, कोशवृद्धि आदि अनेक रोगों में से किसी न किसी के शिकार अवश्य हो जाते हैं, आयुर्वेद शास्त्र में मृगचर्म पर बैठने से अर्श (बवासीर) और भगन्दर का शान्त हो जाना लिखा है। यदि साधक पहिले से ही इस आसन पर नित्य बैठना आरम्भ कर देगा तो अर्श आदि रोग उत्पन्न ही न होंगे। यह भी उक्त आसनका एक लाभ है।
मृगचर्म जहाँ सात्विक विद्युत् से परिपूर्ण है—व्याघ्र और सिंहचर्म वहाँ राजस विद्युत् से परिपूर्ण है। उस पर बैठने से ओज बल पराक्रम बढ़ता है, इसीलिए भारतीय राजा लोग अभिषेक के समय से लेकर सदैव सिंहचर्म निर्मित आसन='सिंहासन' पर आसीन रहते थे। प्रत्यक्ष भी देखने में आता है कि खूब 'ट ट' बोलते हुए मृदङ्ग तबले ढोल या नगारे पर सिंह, व्याघ्र चर्म को छुआ दिया जाय तो वे पसीज कर ढम-ढम बोलने लग जाएँगे, अर्थात्—जैसे जीवनकाल में वीर सिंह की दहाड़ से उक्त भीरू जीवों का हृदय विदीर्ण हो जाता था, मरने पर भी चर्मों ने अपने २ स्वभाव का परित्याग नहीं किया। व्याघ्र और सिंह के आसन के निकट मच्छर, डांस विषैले-कीड़े, बिच्छू सर्प आदि जीव भी नहीं आ सकते, यह हमने स्वयं अनुभव किया है। इसलिए उक्त आसनों पर बैठकर समाधि लगाने में किसी विषैले जीव के निकट आने की आशंका नहीं रहती।
मृत्यु हो जाने पर भी स्वभाव न बदलने की बड़ी विचित्र विचित्र घटनाएँ लोक में देखने को मिलती हैं। कई मछलीभोजी सज्जनों ने हमें बतलाया कि मछली के मांस में एक काँटा रहता है, जो बहुत पकाने पर भी कैडा ही रहता है, अतः उसका गले में चुभ जाने का भी खतरा रहता है। उसके ठीक परिपाक के लिए मत्स्यभोजी उस हँडिया में एक बगुले की अस्थि डाल देते हैं, जिससे काँटे वाँटे सब मिनटों में पसीज जाते हैं, इसका तात्पर्य यह हुआ, कि अस्थि सहित मछली को खा जाने वाले बगुले की मृत अस्थि में भी यह क्षमता बनी रहती है, कि वह मछली के काँटे को पका डाले। उल्लू की आँख का अञ्जन रात में भी दीखने की शक्ति का उत्पादक है, रातौन्धा के रोग में इसका उपयोग होता है। कच्छप की चर्बी में 'अकरकरा' मिलाकर लेप करने से अग्नि, बाधा नहीं पहुँचाती, बहुत से पाखण्डी पाँवों के नीचे लगा आग पर चलते हैं और अपनी सिद्धि की डींग हाँका करते हैं।
उपर्युक्त विवेचना के अनुसार यह निश्चित हुआ, कि मृग व्याघ्र और सिंहचर्म के आसन जहाँ साधकों को ब्रह्मचर्य की सुरक्षा में सहायक सिद्ध होते हैं, यहाँ अनेक शारीरिक रोगों से बचाने की भी सुनिश्चित गारन्टी करते हैं।
धार्मिक अनुष्ठानों के समय कपड़ा, कुर्सी और पत्थर की शिला का आसन की भाँति उपयोग करना निषिद्ध है। कुर्सी ऊँची और यथेष्ट चौड़ी न होने के कारण जहाँ सिद्धासन सुखासन और पद्मासन आदि बैठने के धार्मिक ढङ्गों के अनुकूल नहीं, वहाँ हवन आदि कृत्य के समय तो केवल वायुशुद्धि के निमित्त सामग्री झोंकने के काम को छोड़कर देव पूजन आदि किसी काम में आ ही नहीं सकती, क्योंकि ऐसा करने से देव शक्ति का अपमान भी होता है। वस्त्र का आसन बनाने वाले की दरिद्रता भरी पञ्चायत में प्रकट हो जाती है। जिसके यहाँ कुशा का चार पैसे का आसन भी न हो, किन्तु जिस कपड़े को ओढ़ता पहिनता हो उसी धोती अंगोछे कमीज को नीचे बिछाना स्वयं अपनी दरिद्रता का ढोल पीटना है, इसलिए कपड़े के आसन से दारिद्र्यफल का शास्त्रीय उल्लेख सुस्पष्ट ही है। शिलाखण्ड पर बैठने से रोग होजाना लिखा है, सो प्रत्यक्ष ही है, पत्थर गर्मी में बहुत गरम हो जाता है और सर्दी में बहुत ठिठुर जाता है। पत्थर का कड़ापन तो मूढ़ भी जानते हैं। सो यदि पूजा-पाठ में घण्टों कोई ऐसे आसन पर निरन्तर बैठेगा, तो निश्चित ही वह गुदा सम्बन्धी किसी रोग का शिकार बन जाएगा, साथ ही कपड़ा और पत्थर, पार्थिव विद्युत् से मानव पिण्ड को पृथक् करने की क्षमता भी नहीं रखते क्योंकि ये दोनों ही वस्तु (शुचि)=नानकन्डैक्टर पदार्थ नहीं हैं अतः इनसे आसन के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती।