प्रातः सन्ध्या पूर्वाभिमुख होकर और सायं सन्ध्या पश्चिमाभिमुख होकर करनी चाहिये, तथा देवकर्म्म पूर्व दिशा को, ऋषिकर्म्म उत्तर दिशा को और पितृकर्म्म दक्षिण दिशा को मुख करके करना चाहिए-ऐसी शास्त्रोंमें विधि पाई जाती है यथा—

शास्त्रीय-स्वरूप

(क) प्राची दिगग्निरधिपतिः, दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिः प्रतीची दिग् वरुणोऽधिपतिः, उदीची दिक् सोमोऽधिपतिः। (अथर्व ३।२७।१४)

(ख) देवानामेषा दिग् या प्राची पितृणामेषा दिग् या दक्षिणा।

(ग) प्राचीं……दम्पती संश्रयेथाम्। दक्षिणां यमः पितृभिः। प्रतीचीं…श्रयेथां सुकृतः…। दिशामुदीचीं…कृणवन्नो अग्रम्। (अथर्व १२।३।७-१०)

(घ) उत्तराभिमुखो भूत्वा…योगाभ्यासं स्थितश्चरन्।
(त्रिशिखी ब्राह्मणोपनिषद् १८-१९)

अर्थात्—(क) पूर्व दिशा का अधिपति अग्नि है, दक्षिण का इन्द्र, पश्चिम का वरुण और उत्तर का सोम हैं। (ख) पूर्व दिशा देवताओं की और दक्षिण दिशा पितरों की है। (ग) [विवाहादि कृत्यों में] जाया और पति पूर्व दिशा का आश्रय लें। यम और पितरों के कर्म में दक्षिण दिशा। [सायंकालीन सन्ध्या आदि] सुकृत उपार्जन में पश्चिम दिशा। और उच्चतम आदर्श स्वाध्यायादि ऋषि कर्म्म में उत्तर दिशा प्रशस्त है (घ) उत्तर दिशा को मुख करके योगाभ्यास करे।

वैज्ञानिक विवेचन

अमुक दिशा की ओर मुख करके धार्मिक अनुष्ठान करने की व्यवस्था केवल सनातन धर्मी हिन्दुओं में ही नहीं है, अपितु इसका कुछ न कुछ आभास आर्यसमाज और अन्यान्य अहिन्दु पन्थों में भी प्रायः पाया जाता है। आर्यसमाज की 'संस्कार विधि' में प्रायः प्रत्येक संस्कार के प्रारम्भ में पूर्वाभिमुख बैठने का उल्लेख विद्यमान है। यथा—

(क) [जातकर्म्म संस्कार के समय] बालक का पिता, पूर्वाभिमुख बैठे। (संस्कार विधि पृष्ठ ५७)

(ख) [वेदारम्भ संस्कार के दिन] कार्यकर्ता पूर्वाभिमुख बैठे। (सं० वि० पृ० ८७)

(ग) [समावर्तन में] पूर्वाभिमुख आचार्य बैठे।
(सं० वि० पृ० ११२)

(घ) [विवाह संस्कार में] कन्या वर, पूर्वाभिमुख बैठें।
(सं० वि० पृ० १३०)

मुसलमान काबा की ओर मुख करके ही अपनी मजहबी रसूमात अदा करना अनिवार्य समझते हैं, उनकी कबरें और मस्जिदें भी ठीक एक ही दिशा में बनाई जाती हैं, चाँद भी वह केवल शुक्ला दूज का ही पूज्य समझते हैं, क्योंकि वह पश्चिम दिशा में उदित होता है। पूर्व में उदित हुआ पूर्ण चन्द्रमा भी उन्हें मान्य नहीं, यहाँ भी कट्टरता की पराकाष्ठा प्रकट करते हैं। ईसाइयों के गिरजाघरों का भी पूर्व दिशा में ही द्वार रहता है। जैन बौद्ध और पारसी भी प्रायः ऐसा ही मानते हैं।

यद्यपि अहिन्दू पन्थ अपनी मान्यता का कोई वैज्ञानिक हेतु बतलाने में असमर्थ हैं, क्योंकि उनके यहाँ तो केवल परम्परा=रूढ़ि ही इसका प्रधान हेतु कहा जा सकता है, परन्तु हमारे ऋषियों का मुसलमानों की भाँति किसी एक ही दिशा का निरर्थक आग्रह नहीं है, बल्कि उन्होंने तो वैदिक विज्ञान के अनुसार जो कार्य जिस दिशा में मुख करने से अनुकूल जान पड़ा उस कार्य में उसी दिशा का विधान किया, यथा—

प्रातःकालीन सन्ध्या-वन्दन आदि कृत्यों में और संस्कार आदि धार्मिक अनुष्ठानों में पूर्व को मुख करने की इसलिये विधि है, कि ब्रह्ममुहूर्त से लेकर मध्याह्न तक सूर्य का आकर्षण सामने रहने से मानव पिण्ड के ज्ञान-तन्तु अधिक से अधिक स्फूर्तिसम्पन्न रहेंगे जिससे दैवी गुणों के विकास के कारण हमारे ये धार्मिक अनुष्ठान प्रभावशाली सिद्ध होंगे।

पठन पाठन स्वाध्याय आदि ऋषिकर्म्मों में उत्तर दिशा को मुख करने का प्रधान हेतु यह है, कि आध्यात्मिक जगत् का एकमात्र विश्वविद्यालय 'हिमालय' धर्म्म प्रधान भारतवर्ष से उत्तर दिशा में विराजमान है। मानसरोवर और जमनोत्तरी से ऊपर का भाग तथा गौरी शिखर आदि हिमालय की ऊँची चोटियें इस अनेक साधन सम्पन्न विज्ञान युग में भी मानव स्पर्श से अभी तक सर्वथा अस्पृष्ट बनी हुई हैं और बनी रहेंगी। कवि कालीदास के शब्दों में यह पवित्र पर्वत केवल पत्थरों का बेडौल ऊँचा टीला मात्र नहीं है, अपितु दैवी गुणों की प्रसव भूमि होने के कारण स्वयं भी 'देवात्मा' कहा जाता है। इसलिये तादृश आर्ष कर्म्मों के समय उसके सम्मुख रहने से मनोविज्ञान सिद्धांत के अनुसार अनुष्ठाता के सामने भी ऋषियों के उच्चतम आदर्श उपस्थित रहते हैं। अथ च चतुर्दश विद्याधिपति भगवान् महेश्वर भी उत्तर में ही कैलाश पर्वत पर विराजते हैं। 'विद्याकामस्तु गिरिशं' इस श्रुति के अनुसार शंकर की आराधना पूर्वक विद्या ग्रहण करने के लिये विद्याधीश्वर महेश्वर के सान्निध्य में उत्तराभिमुख बैठकर ही तो सफल स्वाध्याय हो सकता है। 'विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः'—के अनुसार समस्त विद्याओं की अधिष्ठात्री भगवती जगदम्बिका का निवास भी उत्तर में ही है, अतः पठन पाठन स्वाध्याय के लिये उत्तर दिशाभिमुख होना सर्वथा सुसंगत है।

पितृकर्म्म में दक्षिण दिशा में मुख करने का अभिप्राय भी स्पष्ट है। वेदादि शास्त्रों में दक्षिण दिशा में चन्द्रमा से ऊपर की कक्षा में पितृलोक की अवस्थिति मानी है, तदनुसार पितृकर्म का अनुष्ठान दक्षिण में मुख करके करना स्वाभाविक ही है। इसके अतिरिक्त पूर्व में मुख करने से सूर्य का प्रबल आकर्षण आहूत पितरों की आत्माओं के आगमन में अवरोधकारक हो सकता है, इससे पितृकर्म्म में पूर्व में मुख करना प्रतिकूल पड़ता है। उत्तर दिशा में मुख करने से—दक्षिण दिशा की ओर से पधारने वाले पितरों की ओर पीठ फेरकर बैठना वैसा ही अपमान जनक है, जैसा कि किसी समागत प्रतिष्ठित सम्बन्धी को आते देखकर पीठ फेर लेना माना जा सकता है। साथ ही 'ग्रहचक्र' और 'शिशुमार चक्र' की प्रगति पूर्व और पश्चिम दिशा के बीचो बीच रहती है, इसका भी, आहूत पितरों की सूक्ष्म आत्माओं पर प्रभाव पड़ता है। इसी हेतु से श्राद्ध के लिए कुतप='अपराह्न' काल—श्रेष्ठ माना है, क्योंकि उस समय सूर्य रश्मियें अर्वाचीन हो जाती हैं। श्राद्ध में सन्यासी आदि ज्ञानप्रधान चतुर्थाश्रमियों का भी इसी आशय से निषेध है, क्योंकि उनके पिण्डों में आहूत पितरों की आत्माएँ प्रविष्ट होती हुई संकोच करती हैं। इन सब कारणों से पितृकर्म्म के लिये दक्षिण दिशा को मुख करने की विधि है।

स्वामी दयानन्द जी ने अपनी 'संस्कार विधि' के समावर्तन संस्कार में समावृत ब्रह्मचारी द्वारा दक्षिण दिशा में मुख करके 'ओं पितरः शुन्धध्वम्' यह मन्त्र बोलकर जल की भरी अञ्जलि भूमि पर छोड़नी लिखी है—इस इतिकर्तव्यता की कथित जीवित पितरों के श्राद्ध से कुछ भी संगति नहीं बैठ सकती, अतः यह विधि निःसन्देह मृत पितरों के तर्पण के उद्देश्य से ही यहाँ अङ्कित हुई है, सो यहाँ भी दक्षिण दिशा का विधान सुस्पष्ट है।

सायं सन्ध्या के समय सूर्य, पश्चिम दिशा में अस्त होने को होता है, अतः उस समय पश्चिम को मुख करना भी उन सब लाभों का हेतु होता है जो लाभ प्रातःकालीन सन्ध्या के समय पूर्व को मुख करने से प्राप्त होते थे। इस प्रकार हमारे यहाँ अमुक दिशा को मुख करने का विधान निर्हेतुक नहीं किंतु अनेक अटल कारणों से भरपूर है।