समस्त धार्मिक अनुष्ठानों के आरम्भ में ग्रंथी लगाना भी सर्वथा आवश्यक माना गया है यथा—

शास्त्रीय स्वरूप

(क) यशसे श्रियै शिखा। (यजु.)

(ख) सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च।

(ग) गायत्रीमन्त्रेण शिखां बद्ध्वा।

अर्थात्—(क) यश और लक्ष्मी=शोभा के निमित्त शिखा धारण करे। (ख) सदैव [द्विज] यज्ञोपवीत धारण करे, और [अन्य हिन्दू] शिखा बाँधी रक्खे। (ग) [यथाधिकार] गायत्री मन्त्र से शिखा बाँधकर धार्मिक कृत्य करे।

वैज्ञानिक-विवेचन

शिखा के सम्बन्ध में इस ग्रंथ में अन्यत्र विस्तारपूर्वक लिखा गया है। यहाँ तो केवल इतना ही प्रसंग है कि सन्ध्यावन्दन यज्ञानुष्ठान आदि प्रत्येक धार्मिक कृत्य में आरम्भ में सर्वप्रथम शिखा में ग्रन्थी लगानेकी अनिवार्य विधि है, यह क्यों ?—इसलिये कि—

आसन माला विवेचन के अनुसार पाँवों हाथों की भाँति, वातावरण से प्रभावित होने वाला मानव पिण्ड का पाँचवाँ अंग मस्तक है। देखने में तो यह गोल मटोल है परन्तु आँख, नाक, कान आदि छेदों की भाँति शिर में भी एक गुप्त द्वार है—जिसे 'दशम द्वार' भी कहते हैं। यजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद् के शिक्षाध्याय (१।६।१) में वर्णन आता है कि—

(क) अन्तरेण तालुके य एषः स्तन इव अवलम्बते स इन्द्रयोनिः। अत्र असौ केशान्तो विवर्तते, व्यपोह्य शीर्षकपाले।

(ख) आन्तरो मस्तकस्योर्ध्वं शिरासन्धिसमागमः।
रोमावर्तोऽधिपो नाम मर्मः सद्यो हरत्यसून्॥
(अष्टाङ्गहृदय शरीरस्थान)

अर्थात्—(क) तालू के अन्दर जो स्तन सा लटकता दीख पड़ता है इसका नाम इन्द्रयोनि है, इसके ठीक समान सूत्र में कपाल स्थान पर जो रोम राशि है वह मर्म रक्षक है। (ख) मस्तक के ऊँचे अभ्यन्तर स्थान में जहाँ शरीर की समस्त शिराओं का समागम होता है उस स्थान के रोमों के आवर्त का नाम 'अधिप' है, जो बहुत मर्मस्थल है, जिसके उपद्रुत होने से तत्काल मृत्यु हो जाती है।

सो उक्त गुप्त छिद्र=दशम द्वार की संरक्षा के लिये वैदिक विज्ञान के अनुसार यहाँ शिखा रखी जाती है, धर्म्मानुष्ठान के समय इस मार्ग से वातावरण, उपार्जित आध्यात्मिक शक्ति का विनाश न कर सके—एतदर्थ द्वार बन्द करने की भाँति शिखा को गांठ लगानी आवश्यक है। विद्युत् शास्त्र का यह अटल सिद्धांत है कि नोकीले पदार्थ विद्युत् शक्ति का भेदन कर देते हैं। उनमें वह झटिति प्रविष्ट हो जाती है, वर्तुलाकार घेरेदार किंवा आबद्ध पदार्थों पर वह सहसा संक्रान्त नहीं होती। सो शिखामें गांठ लगाना, समाधि के समय अंगुष्ठ और तर्जनी के मेल से वर्तुल बनाना, किंवा मुट्ठी बांधना ये सब क्रियायें पूर्वोक्त विद्युत् सिद्धांत पर आधारित हैं।

ऊँचे २ हिन्दू मन्दिरों के शिखरों पर नोकीली लोहशलाका लगाना भी आकाश से गिरने वाली बिजली के वेध को रोकने के अभिप्राय से ही है। भारतीय ऋषियों ने मन्दिरों के शिखरों पर चक्र, त्रिशूल और कलश की आकृतियें बनाकर वर्तुल वेध सिद्धान्त से बहुत लाभ उठाया है। इसलिये हमारा कोई प्राचीन मन्दिर बिजली के पात से भूमिसात् हुआ हो ऐसा इतिहास में कोई प्रमाण नहीं मिलता। पाश्चात्य विज्ञानवेत्ताओं ने जब ऊँचे मीनारों पर विद्युत् पात की आशङ्का समझी तो उन पर हमारे मन्दिरों की भाँति लोहशलाका लगाकर उसका पृथ्वी पिण्ड से सम्बन्ध जोड़ दिया। यह बात किसी भी ऊँची इमारत पर लगी सींख और ऊपर से पृथ्वी तक लगी पत्ती में जानी जा सकती है। अस्तु,

शिखा बन्धन का हेतु—गुप्तद्वार, दशमद्वार, इन्द्रयोनि अधिप और मस्तुलिंग आदि अनेक नामों से पुकारे जाने वाले उस स्थान की रक्षा करना है जो कि मानव पिण्ड में सर्वाधिक मर्म स्थान माना जाता है। हमारे इस शिखाबन्धन का ही यह प्रत्यक्ष फल है कि भारतीय ऋषियों के लिखे हुये 'दर्शन शास्त्र' आज भी उनके सही मस्तिष्क होने की साक्षी देते हैं।