सन्ध्या में बायें हाथ में दर्भ मुष्टि रखने का, अन्यान्य धार्मिक अनुष्ठानों में अंगुलियों में कुशनिर्मित पवित्री पहिनने का तथा जप में माला फेरने का और समाधि के समय तर्जनी और अंगुष्ठ की कुण्डलाकृति किंवा मुष्टिकाकृति बनाने का शास्त्र में उल्लेख मिलता है, माला आदि विषयों पर तो यथास्थान विचार किया जाएगा यहाँ कुशा के विषय में विचार किया जाता है।
शास्त्रीय-स्वरूप
(क) दर्भो य उग्र औषधिस्तं ते बध्नामि आयुषे।
(ख) नास्य केशान् प्रवपन्ति नोरसि ताडमाघ्नते
यस्मा अच्छिन्नपर्णेन दर्भेण शर्म्म यच्छति॥
(ग) दर्भेण देवजातेन दिविष्टम्भेन।
(घ) दर्भः परिपातु विश्वतः। (अथर्व १९।३२।१-१०)
(ङ) द्वौ दर्भौ दक्षिणे हस्ते वामे त्रीन् आसने सकृत्।
उपवीते शिखायाञ्च पादमूले सकृत् सकृत्॥
(देवी भागवत ११।२०)
(च) अग्निस्सूर्य्यश्चन्द्रमा भूमिरापो, द्यौरन्तरिक्षं
प्रदिशो दिशश्च। आर्तवा ऋतुभिः संविदाना
अनेन मा त्रिवृताः पारयन्तु॥ (अथर्व ५।२८।२)
अर्थात्—(क) कुशा=दर्भ तत्काल फल देने वाली महौषधि है। उसे आयुवृद्धि के निमित्त धारण करना चाहिए। (ख) जो मनुष्य अच्छिन्नपर्ण दर्भ पहिनकर कल्याणान्वित होता है उसके बाल नहीं झड़ते और नांही छाती में आघात पहुँचता है। (ग) कुशा दैवी गुणों से उत्पन्न हुई है और यह दैवी वातावरण की रोक-थाम की साधन है। (घ) दर्भ चारों ओर फैले वातावरण=ऐटमास्फीयर=से सुरक्षित रखता है। (ङ) दायें हाथ की अनामिका में दो कुशाओं से निर्म्मित पवित्री पहिननी चाहिये, और बांयें हाथ में तीन कुशा से बनी। एक कुशा यज्ञोपवीत में, एक शिखा में और दोनों पांवों के नीचे एक रक्खे। (च) अग्नि, सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, जल, द्यौ, अन्तरिक्ष, दिशा, विदिशा ऋतुवें और उनसे होने होने वाले गर्मी-सर्दी आदि प्रभाव रूप=वातावरण से [पांव हाथ मस्तक] तीनों स्थानों की रक्षा के उपायों द्वारा मुझे पार कीजिए।
वैज्ञानिक-विवेचन
कुशा की पवित्री हाथों में इसलिए पहिनी जाती हैं, कि जैसे पार्थिव विद्युत्-प्रवाह पांवों के मार्ग से मानव पिण्ड की सञ्चित आध्यात्मिक शक्ति को खेंचकर विनष्ट कर देता है और उसकी रोक थाम के लिये पांवों के नीचे आसन बिछाना अनिवार्य है, ठीक इसीप्रकार अन्तरिक्ष व्याप्त विद्युत्प्रवाह—जिसे आज की वैज्ञानिक भाषा में 'ईथर' कहते हैं—भी मानव पिण्ड को चारों ओर से निरन्तर घेरे रहता है। हमारे शरीर के पांच स्थानों द्वारा ही वह हमें प्रभावित कर सकता है—दोनों पांव, दोनों हाथ और मस्तक। क्योंकि हमारे शरीर के यही पांच अङ्ग अन्तिम भाग हैं। सो, प्रत्येक धार्मिक कृत्य में सिद्ध, पद्म, सुख जिसभी आसन से बैठने का विधान है, उसमें दोनों पांव घुटने के नीचे दब जाते हैं। पांव फैलाकर या टांग पर टांग रखकर बैठना हमारे यहां अनुचित समझा जाता है, गुरु सन्निधि में और शिष्ट समाज में कोई भी सभ्य हिन्दू उपर्युक्त रीति से नहीं बैठेगा। जिस प्रकार आसन के प्रभाव से और पांव की अंगुलियां छुपाकर पांवों के मार्ग से हम अवाञ्छित बाह्य वातावरण से अपनी रक्षा कर लेते हैं, ठीक इसी प्रकार हाथों के मार्ग से भी वह वातावरण हमें प्रभावित न कर पाए—अर्थात्—धर्मानुष्ठान द्वारा सञ्चित हमारा आध्यात्मिक बल अपक्षीण न हो एतदर्थ कुश=घास निर्मित पवित्रियें हाथों में धारण की जाती हैं।
हम पीछे कह आये हैं, कि दर्भ भी 'शुचि'=नान कन्डैक्टर पदार्थ है, वह भी विद्युत्प्रवाह के संक्रमण में बाधक है। पूर्वोक्त वेद प्रमाणों में कुश धारण के तीन प्रधान लाभ आए हैं। (१) कुश धारण से शिर के बाल नहीं गिरते (२) छाती में आघात नहीं होता और (३) वातावरण का प्रभाव नहीं पड़ता। इससे सहज ही में यह अनुमान किया जा सकता है, कि जप, पूजा, पाठ और अनुष्ठान के समय यदि हाथों द्वारा शरीर में प्रविष्ट होने वाले 'ईथर' से आत्म-रक्षा न की जाय, तो इसका मस्तिष्क और हृदय पर बुरा प्रभाव पड़ता है। दिल और दिमाग की विकृति निश्चित ही मृत्यु का मुख्य कारण है। इसीलिए कुश धारण का मुख्यफल आयुष्य वृद्धि वेद ने बतलाया है।
वातावरण नई खोज में—
यहाँ यह समझ लेना भी आवश्यक होगा, कि आज के युग में वातावरण का अस्तित्व और उसका अनिवार्य प्रभाव सभी वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं। थियासोफीकल सोसाइटी का यह प्रधान सिद्धान्त है, कि—हर समय अनेक बुरी और भली मृतात्माएँ मनुष्य को चारों ओर से घेरे रहती हैं, जब हम भली आत्माओं से प्रभावित होते हैं तो अच्छी २ बातें सोचते हैं और जब बुरी आत्माओं से आक्रान्त हो जाते हैं तब बुरे-बुरे विचार करने लगते हैं।
पिछले दिनों अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने अपने अनेक वर्षों के अनुभव के बाद यह तथ्य प्रकट किया है, कि यदि ईश्वर-प्रार्थना-स्थान या भले विचार जहाँ किए गए हों ऐसे स्थान के वातावरण का चित्र लिया जाय तो वहां गाय, हाथी, घोड़ा, कमल, सूर्य, चाँद आदि शोभन वस्तुओं के चित्र अङ्कित होंगे। और यदि शराब-खाने, वध्यशाला, द्यूत भवन और चोर डाकुओं की बैठकों का चित्र लिया जाय तो वहाँ कुत्ता, गधा, सूअर, कबर, शूलों, छुरे और कव्वे तथा गीधों से मिलती-जुलती शक्लें बनेंगी। ये महोदय अपने इस विषय में इतने सिद्धहस्त हैं, कि वे किसी भी खाली हाल का चित्र लेकर अपने यन्त्र की सहायता से यह बता सकते हैं, कि इस हाल में अभी बुरी या भली कैसी टोली बैठी थी और वह कैसी चर्चा कर रही थी।
संसार में सभी मतमतान्तरवादी अपने-अपने पन्थ के महात्माओं के दर्शन करने जाया करते हैं, इसका यही अभिप्राय होता है, कि एक आध्यात्मिक-शक्ति-सम्पन्न महात्मा के निवास स्थान का वातावरण भी इतना पवित्र हो जाता है, कि उसमें पहुँचने पर कोई भी संसार सन्तप्त मनुष्य शान्ति अनुभव करने लगता है। भारतीय ऋषियों के आश्रमों का वर्णन करते हुए यह बात सभी कवियों ने प्रकट की है कि वहाँ रहने वाले सहजवैरी जीव—सिंह मृग, नकुल सर्प, आदि भी वैर त्याग कर देते हैं। योग दर्शन में महर्षि पतञ्जलि ने लिखा है कि—
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधाने सर्व-वैरत्यागः।
अर्थात्—जो अहिंसा का सच्चा उपासक होता है उसके निकट सम्पर्क में रहने वाले सभी प्राणी वैर का परित्याग कर देते हैं।
इतिहास में ऐसे बहुत दृष्टान्त उपलब्ध होते हैं, कि अमुक पुरुष अमुक महात्मा को कामवश अपना शत्रु मानकर मारने चला, परन्तु वहाँ जाने पर वातावरण के प्रभाव से अपने ऐसे कुविचार पर बहुत पश्चात्ताप किया और महात्मा का सेवक बन गया। वाल्मीकि रामायण में वर्णन आता है, कि वशिष्ठ को मारने के पक्के इरादे से वशिष्ठाश्रम में पहुँचे विश्वामित्र, सेवक बनकर लौटे।
इतने पर भी मूर्ख लोग यदि वातावरण,—जिसे यवनादिक 'कुर्रेहवाई' और आंगल भाषा वाले 'एटमास्फीयर' कहते हैं—को न समझ सकें, तो उन्हें यह तो समझ लेना ही चाहिये, कि आखिर रेडियो पर ये दूर २ देशों के संवाद और गाने बिना किसी प्रत्यक्ष सम्बन्ध के कैसे सुने जाते हैं ?—सात समुद्र पार इंगलैंड, जर्मन और अमेरिका में भाषण-ब्राडकास्ट करता हुआ व्यक्ति तत्काल ज्यों का त्यों बोलता कैसे सुना जाता है ? शायद इस प्रत्यक्ष दैनन्दिनी घटना के अस्तित्व में तो किसी बज्रमूर्ख को भी, आज के युग में सन्देह न हो, फिर ऐसा क्यों होता है—इसका प्रधान कारण यह समझ लेना चाहिये कि आँखों से न दीखने वाला एक 'ईथर' नाम का सूक्ष्म तत्त्व है, जो संसार में सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है।
जैसे जलपूर्ण तालाब के उस किनारे से हिलाया हुआ पानी तरंगित होता २ परले किनारे तक जाता है, ठीक इसी-प्रकार ईथर के किसी भी स्थल में किया हुआ शब्द समस्त विश्व में व्याप्त हो जाता है। जहाँ जहाँ उसे पकड़ने वाले रेडियो नामक विद्युत् यन्त्र होंगे वहाँ वहाँ ही वह प्रतिध्वनित हो उठेगा। यह 'ईथर' नामक पदार्थ कोई आधुनिक विज्ञान की नई खोज नहीं। भारतीय ऋषियों ने तो—वायु और आकाश तत्त्व के जिस संमिश्रण को आज 'ईथर' कहा जाता है उसके उत्पादक—'अहं तत्व' और उसके भी उत्पादक 'महत्तत्त्व' की भी परम्परा को केवल जाना ही नहीं बल्कि उससे ब्रह्म तक पहुँचने का मार्ग भी परिष्कृत कर दिया था।
बात बहुत बढ़ गई अतः हम पुनः मुख्य बात पर आते हैं, सो वातावरण के प्रभाव से बचने के लिए हाथ में कुश निर्मित पवित्रियें धारण की जाती हैं।