हमने पीछे कहा है कि सन्ध्या का मुख्य तत्त्व प्राणायाम है। प्राणायाम का तात्पर्य साधारणतया तो प्राणों का व्यायाम है, किन्तु इसका वास्तविक तात्पर्य है प्राणशक्ति पर विजय। शास्त्रकारों ने लिखा है—
प्राणास्तु द्विविधा ज्ञेयाः स्थूलसूक्ष्मप्रभेदतः।
यया जयः स्यात्प्राणानां प्राणायामः स चोच्यते॥
अर्थात्—स्थूल और सूक्ष्म भेदसे प्राण दो प्रकारका होता है और जिस क्रिया के द्वारा दोनों प्रकार के प्राणों पर विजय प्राप्त की जाय उसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणों का व्यायाम प्राणायाम की प्रथम कक्षा कही जा सकती है और प्राण विजय अन्तिम। निरन्तर अभ्यास से प्राणशक्ति पर विजय प्राप्त कर मनुष्य ऐसी दशा में पहुँच जाता है, कि वह समस्त संसार में व्याप्त प्राणशक्ति को जैसे चाहे प्रभावित कर सके और उससे अपने मनोनुकूल कार्य करवा सके।
प्राणशक्ति समस्त संसार में व्याप्त है। कहीं वह स्थूल रूप में है और कहीं सूक्ष्म। मनुष्य पशु पक्षी आदि जीवों में प्राणशक्ति का श्वास प्रश्वास मय स्थूल रूप भली भाँति देखने को मिल ही जाता है, किन्तु वृक्ष लता गुल्म पाषाणादि जड़ वस्तुओं में भी सूक्ष्म प्राणशक्ति निहित है—इस विषय में आज के वैज्ञानिक युग में किसी को सन्देह करने की गुञ्जाइश नहीं रही है। वृक्षादि जड़ वस्तुओं में ही क्यों, पृथ्वी का प्रत्येक परमाणु सूक्ष्म प्राणशक्ति से भरपूर है। यह जल में भी व्याप्त है, तेज वायु आकाश आदि में भी। समस्त संसार के प्राणी, भुवन मण्डल में बिखरे हुए प्राण शक्ति के भण्डार से ही स्वानुकूल शक्ति को ग्रहण कर बढ़ते और जीवित रहते हैं।
ऐसी दशा में प्राणायाम की अन्तिम कक्षा में पहुँचा हुआ साधक यदि अपनी भुवन प्राण विजयिनी शक्ति के प्रभाव से किसी जड़ वस्तु में विद्यमान अविकसित प्राणशक्ति को उद्वेलित कर उससे कोई कार्य ले, तो वह असम्भव नहीं कहा जा सकता। प्राणायाम-साधना-शून्य आज का जगत्, प्राणविजयी योगियों के इस प्रकार के यदा कदा दीख पड़ने वाले चमत्कारों पर विश्वास करे या न करे किन्तु यह निर्विवाद है—कि उनके लिये इस प्रकार के कार्य साधारण हैं। परन्तु इस प्रकार के प्राणविजयी योगी हमारे इस अनुच्छेद का विषय नहीं हैं, इसलिये विस्तार में न जाते हुए हम प्राणायाम के प्रथम अर्थ पर विचार करेंगे।
हाँ, तो प्राणायाम का अर्थ है—प्राणों का व्यायाम। भारतीय महर्षियों ने जहाँ शरीर को चिरकाल तक स्वस्थ एवं कार्यक्षम रखने के लिये व्यायाम पद्धति को दिनचर्या का अंग बनाया वहाँ मनुष्य के प्राण हृदय मन आदि आभ्यन्तरिक अवयवों को दृढ़ एवं पुष्ट बनाने के लिये प्राणायाम का भी आविष्कार किया। श्वास प्रश्वास साधना की यह ऐसी अद्भुत प्रणाली है, कि यदि मनुष्य निरन्तर इसका अभ्यास करे तो कुछ ही दिनों में उसे अनुभव होगा कि उसकी तो काया ही पलट गई। शरीर में प्रसुप्त सभी शक्तियें जाग उठेंगी और एक ऐसा ओज एवं तेज हिलोरें लेने लगेगा, कि किसी प्रकार की चिन्ता कष्ट निराशा आदि उसके समीप भी न आ सकेंगे।
प्राणायाम के अगणित आध्यात्मिक महालाभों का यहाँ विशेष उल्लेख न करके हम उसके शारीरिक व्यायाम और श्वास प्रश्वास साधनात्मक पहलू का उल्लेख क्यों कर रहे हैं, इसका एक मात्र कारण यह है कि इन्द्रियातीत आध्यात्मिक लाभों में आज के जड़-जगत् की आस्था नहीं है। वह तो सब जगह तात्कालिक प्रत्यक्ष लाभ ढूँढता है। यदि वस्तुतः ऐसा कोई लाभ जंचे—तभी वे उसे कर्तव्य कोटि में परिगणित कर सकने की धारणा रखते हैं। इसलिये हमने जान बूझकर प्राणायाम का प्रधान उद्देश्य यहाँ व्यायाम तथा श्वास साधना ही प्रकट किया है।
प्राणायाम का अभ्यास जितनी कम अवस्था से प्रारम्भ होगा वह उतना ही लाभप्रद होगा। प्राचीन भारत में दस बारह वर्ष के उपनीत बालक को सन्ध्या के साथ यह व्यायाम कराया जाता था। बाल्यावस्था में शरीर के समस्त अंगों में बर्द्धनोन्मुखी प्रवृत्ति रहती है और उन्हें जितना सुअवसर मिले वे विकसित हो सकते हैं। उस समय शारीरिक मांसपेशियों, ग्रन्थियों एवं सौत्रतन्तुओं में स्थितिस्थापक गुण भी पर्याप्त मात्रा में होता है इसलिये बालकों को इस व्यायाम से बहुत अधिक लाभ होता है। ज्यों-ज्यों अवस्था बीतती जाती है त्यों-त्यों हम इस प्रक्रिया के अमूल्य लाभों से वञ्चित होते जाते हैं।
आजकल प्रायः मनुष्य जब घरबार के धन्धे से बेकार हो जाते हैं और शरीर वृद्ध हो जाता है तब धर्मोन्मुख होते हैं। तब ही, एक धार्मिक विधान के नाते उनका प्राणायाम से परिचय होता है और वे उसका अभ्यास प्रारम्भ करते हैं। इस अवस्था में प्राणायाम से उन्हें जब कोई विशेष लाभ नजर नहीं आता तब केवल उसे छोड़ ही नहीं बैठते बल्कि उसे व्यर्थ का ढकोसला या दुःसाध्य हठयोग की क्रिया मान बैठते हैं।
बात वास्तव में ऐसी नहीं है। वृद्धावस्था में निरन्तर अभ्यास से प्राणायाम लाभ पहुँचाएगा, किन्तु एक सीमा तक। यह एक प्रकार से ऐसी ही चेष्टा है जैसे किसी वृद्ध मनुष्य को खूब घी दूध खिलाकर और दण्ड कसरत कराकर पहलवान बनाने की चेष्टा। जिस तरह उस समय सेवन किए हुए घृत दुग्धादि पदार्थ केवल उसकी गिरती हुई जीवनशक्ति को यथासंभव बचा सकने मात्र में ही काम आते हैं, इसी प्रकार उस समय किया हुआ प्राणायाम उसके परिपक्व शरीर और प्राणों के लिये सीमित लाभप्रद ही सिद्ध होता है। इसलिये बाल्यावस्था से ही संध्या वन्दनादि का अभ्यास डालना चाहिए। पाठकों को कम-से-कम अपने बालकों को ऐसे महत्त्वपूर्ण अभ्यास से वञ्चित न रखना चाहिए।