(१) शारीरिक विकास—

यद्यपि प्राणायाम का सम्बन्ध मानव जीवन के विभिन्न उपादानों के साथ है। मानव शरीर के विकास से प्रारम्भ करके मनुष्य को अमर बना देने की समस्या के हल तक उसकी पहुँच है, तथापि प्राणायाम का फल—जिसे सब लोग स्वयं अनुभव कर सकते हैं—पूर्ण शारीरिक विकास है।

यह सर्वविदित बात है कि मानव जीवन के लिए तीन वस्तु सर्वाधिक अत्यावश्यक हैं—अन्न, जल और वायु। उन तीनों में भी उत्तरोत्तर एक-दूसरे की अपेक्षा अत्यधिक आवश्यक हैं। अन्न अहोरात्र में एक बार भी मिल जाए, तो मनुष्य जी सकता है और पानी की एक से अधिक बार आवश्यकता रहती है, परंतु इन दोनों की अपेक्षा वायु की तो प्रति श्वास अनिवार्य आवश्यकता रहती है। यों तो सम्पूर्ण शरीर की वृद्धि ही विशुद्ध वायु पर निर्भर है, यदि ओषजन (Oxygen) वायु फेफड़ों में जाकर मैले रक्त को शुद्ध न बनाये तो हमारा शरीर जीवित ही न रहे, तथापि फुफ्फुस, (फेफड़े) छाती, हृदय आदि प्रधान-प्रधान अवयवों का विस्तार एवं कार्यक्षम होना तो सर्वथा वायु पर आश्रित है। इसे समझने के लिए यह आवश्यक होगा कि हम श्वासक्रिया और उससे संबंधित अंगों का कुछ परिचय प्राप्त करलें।

प्रत्येक प्राणी के शरीर में श्वास मार्ग का प्रारम्भ नाक के छिद्रों से होता है। नाक में हवा की पेचदार नली है जिसमें से गुजरती हुई हवा रक्त की गर्मी से गरम होकर श्वास नली द्वारा फेफड़ों में प्रवेश करती है। वायु में मिले हुये धूल-कणों, अदृश्य अणुकीटों आदि को रोकने के लिये प्रकृति ने नाक में बालों की छलनी लगाई है जो अनावश्यक वस्तुओं को बाहर ही रोक देती है। चूँकि मुँह में न तो वायु छानने का कोई साधन ही प्रकृति ने लगाया है और न हवा को गरम करने का, इसलिए मुँह द्वारा कभी सांस न लेना चाहिए। यह सर्वथा हानिकारक है।

प्रस्तुत चित्र को ध्यान से देखने से आपको मालूम होगा कि हमारे गले में दो नलियाँ हैं—(१) श्वास नली, (२) अन्न नली। नीचे जाकर श्वास नली के दो भाग हो गये हैं, एक दाहिने फेफड़े में जाती है दूसरी बायें में। इन नलियों के फेफड़ों में पहुँचने पर उनसे और भी छोटी २ नलियां निकलती हैं, फिर इनसे भी छोटी और और भी छोटी, यहाँ तक कि फेफड़ों में इन श्वास-नलिकाओं की संख्या अन्यून साठ करोड़ हो जाती है। यह नलिएँ वायु-मन्दिरों में प्रविष्ट होती हैं। आगे अर्ध गोलाकार वायुकोष्ठों का विस्तृत जाल फैला हुआ है, जो जीवन को गति देने के लिये ओषजन वायु के विस्तृत भण्डार को सुरक्षित रखने एवं शारीरिक-गैस-सम्पृक्त कार्बन द्विओषित को बाहर निकालने के काम आता है।

यही हमारे फेफड़े हैं। फेफड़े इतने बड़े होते हैं कि यदि उनके सौत्र जाल को फैलाया जा सके—जैसा कि असम्भव है—तो उन्हें दो बीघा भूमि पर बिछाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त वे इतने हलके होते हैं कि यदि फेफड़े के रोग से अनाक्रांत किसी व्यक्ति के फेफड़ों को पानीपर छोड़ा जाए तो वे तैरेंगे, डूबेंगे नहीं।

फेफड़ों का कार्य है—कूड़े कचरे एवं मैल को दूर करके शारीरिक यन्त्रों को कार्यक्षम रखना। यह कार्य वे वायु की सहायता से करते हैं। अनेक प्रकार की रासायनिक क्रियाओं, सैलों के टूटने एवं शारीरिक यन्त्रों के काम में आने से शरीर में कूड़ा-करकट अनेक प्रकार की गैस आदि इकट्ठी होती रहती है। अभिसरण करता हुआ रक्त इनमें से बहुत से अंश को अपने साथ लेकर और दूषित होकर पहले हृदय के दाहिने कोष्ठक में आता है वहां से शुद्ध होने के लिए फेफड़ों में। श्वास के साथ गई हुई ओषजन (Oxygen) उसमें से मैल के अंश को ग्रहण कर लेती है, और कर्बन द्विओषित बनी हुई वह वायु, वक्षोदर मध्यस्थ पेशी की स्थिति-स्थापक क्रिया द्वारा उच्छ्वास के रूप में बाहर फेंक दी जाती है। शुद्ध हुआ रक्त अभिसरण के लिये वापिस हृदय के वाम प्रकोष्ठ में चला जाता है।

इस प्रकार हमने देखा मानव शरीर में वायु महत्त्वपूर्ण कार्य करती है और वायु ग्रहण करने के लिये प्रकृति ने शरीर में अनेक अवयवों का निर्माण किया है। किन्तु यह कार्य ठीक-ठीक रूप से तभी सम्पन्न हो सकते हैं जबकि विशुद्ध वायु का ग्रहण पर्याप्त रूप में हो। साधारण श्वास में हम जितनी वायु ग्रहण करते हैं वह इतनी नहीं होती कि फेफड़े की प्रत्येक कोठरी में पहुँच सके। परिणाम यह होता है कि फेफड़ों की हजारों कोठरियां काम में न आने के कारण विकसित होने से तो वंचित रह ही जाती हैं, साथ ही निरन्तर बेकार पड़ी रहने से इतनी कमजोर हो जाती हैं, कि रोग के क्षणिक आक्रमण को भी नहीं सह सकतीं।

कहना न होगा कि जिस श्वासयन्त्र से हमें दिन-रात काम लेना है, उसकी कभी सफाई भी तो आवश्यक है। संसार में ऐसी मशीन कितने दिन स्थिर रह सकेगी जिसको कि लगातार चौबीसों घन्टे बेतहाशा पेला जाए, परन्तु कभी झाड़-पोंछकर साफ करने का नाम न लिया जाए। आज सन्ध्या न करने का ही यह प्रत्यक्ष कुफल है, कि संसार में श्वास नलिका और श्वास-प्रश्वास के मुख्य साधन फुफ्फुस (फेफड़ों) की बीमारी उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है।

आज कलकारखानों के विषाक्त धूएं से परिपूर्ण एवं संकीर्ण वातावरण में रहने वाली जनता, विशुद्ध वायु और प्राणायाम के अभाव के कारण द्रुत गति से विनाश की ओर अग्रसर है। पहिले समय में 'यक्ष्मा' आदि असाध्य रोगों को 'राजरोग' के नाम से स्मरण किया जाता था इसीलिये इस नामुराद बीमारी का नाम ही राजयक्ष्मा पड़ गया था। प्रायः विषयासक्त और भोगरत राजा लोग ही इसके शिकार होते थे, परन्तु अब तो किसान मजदूर और सड़क पर बैठे भिखमंगे तक भी तपेदिक T. B. के मरीज दीख पड़ते हैं, यह सब अनियमित श्वास लेने का ही दुष्परिणाम है। इसलिये आयुष्य वृद्धि की कामना रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उचित है, कि वह नित्य विधिवत् सन्ध्योपासना करते हुए प्राणायाम द्वारा अपनी श्वास नलिका और फुफ्फुसों (फेफड़ों) को सदैव बलशाली बनाने का प्रयत्न करे।

प्राणायाम में पूरक विधि द्वारा बहुत सी विशुद्ध वायु को फेफड़ों में फेंका जाता है। कुम्भक विधि में जब वायु को कुछ क्षण के लिये रोका जाता है तो वह फेफड़ों की सम्पूर्ण कोठरियों में प्रवेश करती है। उन्हें फैलाती है और वायु के साथ इन कोठरियों में रक्त भी जाता है। इससे फेफड़े बलवान्, वक्षस्थल चौड़ा, हृदय नवरक्तयुत तो बन ही जाता है, साथ ही रुका हुआ वायु, रक्त से अधिक-से-अधिक कर्बनद्विओषित (Carbandioxide) गैस और मलीय अंश को लेकर बाहर आता है। रेचक विधि से जब सब वायु बाहर आ जाता है तो फेफड़ों को विश्राम मिलता है और वे तरोताजा हो जाते हैं।

प्राणायाम द्वारा शारीरिक विकास को परखने के लिये एक सीधे-साधे परीक्षण का प्रयोग किया जा सकता है। यदि किसी बकरे के ताजे फेफड़ों—जिनमें श्वासनलिका जुड़ी हुई हो—में साइकिल के पम्प से हवा भरना प्रारम्भ करें तो आप देखेंगे कि वे धीरे-धीरे फूलने लगेंगे। हवा भरते जाइये यहाँ तक कि वे साधारण दशा से दुगने-तिगुने फूल जाएंगे। यह फुलावट कुछ समय तक रखी जा सकती है और हवा निकाल देने पर वे फिर पिचक जाते हैं। यह परीक्षण इस बात का प्रत्यक्ष निदर्शन है है कि यदि महर्षि निर्दिष्ट विधि से प्रतिदिन सन्ध्या प्राणायाम किया जाय और साधारण दशा में भी गहरा श्वास ग्रहण करने का अभ्यास डाला जाय तो शरीरका परिपूर्ण विकास निश्चित है।

(२) श्वास-साधना—

प्राणायाम का दूसरा उद्देश्य 'श्वास साधना' कहा जा सकता है। संसार में अभ्यास द्वारा सभी कुछ सम्भव हो सकता है, इसलिये निरंतर अभ्यास से वायु को चिरकाल तक फेफड़ों में ही रोक रखने की सामर्थ्य कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यह प्रत्यक्ष अनुभव की बात है कि आप सामने घड़ी रखकर प्राणायाम प्रारम्भ कीजिए और प्राणावरोध के सैकिन्डों को नोट कर लीजिए। प्रतिदिन ऐसा ही करते जाइये। एक मास बाद आप देखेंगे कि आपकी अवरोध शक्ति में पहले दिन से बहुत काफी अन्तर पड़ गया है। यह अन्तर सैकिन्डों से प्रारम्भ होकर मिनटों और घण्टों तक पहुँच सकता है। यही नहीं, यदि साधक निरंतर इस अभ्यास को बढ़ाये तो दिनों महीनों और वर्षों के लिये श्वासावरोध की शक्ति उत्पन्न हो जाना असम्भव न होगा। निःसन्देह यह स्थिति योगियों की होगी और उस समय समझना चाहिए कि साधक ने प्राणों पर विजय प्राप्त कर ली है।

(३) मानसिक विकास—

मानसिक विकास भी प्राणायाम का एक उद्देश्य है। यह एक ऐसी अद्भुत व्यायाम पद्धति है जो शरीर के साथ मन का भी पूर्ण व्यायाम कराती है। प्राणायाम की पूरक, कुम्भक, रेचक, तीनों अवस्थाओं में, इधर उधर भागते हुए चञ्चल मन को पकड़ पकड़ कर ध्यानकेन्द्र में लाया जाता है। उसे कहा जाता है कि वह त्रिविध दशाओं में क्रमशः नाभिकमल में चतुर्भुज श्याम स्वरूप विष्णु का, हृदय में कमलासन रक्तवर्ण ब्रह्मा का और ललाट में श्वेतवर्ण त्रिनेत्र रुद्र का ध्यान करे। यथा—

पूरके विष्णुसायुज्यं कुम्भके ब्रह्मणोऽन्तिकम्।
रेचकेन तृतीयन्तु प्राप्नुयादैश्वरं पदम्॥
(प्रयोगपारिजात)

मन चञ्चल है वह नहीं मानता। आता है और बीच में से ही भाग खड़ा होता है। साधक फिर उसे पकड़ता है और ध्यान केन्द्र की ओर लाता है। निरंतर अभ्यास होने पर धीरे-धीरे मन, ध्यानकेन्द्र पर ठहरने लग जाता है और अन्त में वह ऐसा साधक की मुट्ठी में आ जाता है, कि वह चाहे उसका कैसे ही प्रयोग करे। प्राणायाम के इस चमत्कार का भी अनुभव कुछ ही काल के अभ्यास से किया जा सकता है।

(४) क्या मनुष्य अमर हो सकता है ?—

हमारे शरीर की रचना विभिन्न प्रकार के अणुओं द्वारा हुई है जिन्हें सैल्स (Cells) कहा जाता है। इन सैल्सों में बढ़ने तथा बढ़कर दो दो हो जाने की शक्ति होती है, इसी का नाम जीवन है और सैल्स की पूर्ण अव्यवस्था एवं पूर्वोक्त शक्ति का नष्ट हो जाना ही मृत्यु है। ऐसी दशा में आज के वैज्ञानिक-जगत् के सन्मुख यह प्रश्न उपस्थित है, कि क्या मनुष्य के सारे सैल्सों को जीवित रखकर उसे अमर बनाया जा सकता है।

पाश्चात्य वैज्ञानिक इस समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार और परीक्षण कर रहे हैं। एक फांसी लगे हुए अपराधी का दिल उसकी मृत्यु के ११ घण्टे बाद निकालकर उसे पुनर्जीवित किया जा चुका है। प्रो० केरल ने इस दशा में कुछ नव परीक्षण किये हैं और परीक्षण द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि यदि शरीर के किसी पृथक् सैल को उचित खुराक मिलती रहे तो वह अपना कार्य करता चला जायगा। कहते हैं कि उनकी मुर्गी के दिल का टुकड़ा ३० साल से जीवित है, उसे रासायनिक द्रव्यों से ही खुराक प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार अन्य वैज्ञानिक भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं परन्तु अभी तक ऐसा कोई हल नहीं निकाल सके हैं।

प्रो० केरल का कहना है कि अमरत्व न सही, किन्तु सैल्स के जीवन को लम्बा करना दो प्रकार से पूर्ण सम्भावित है। (१) सैल्स को समुचित खुराक मिलती रहे और उनसे निकला हुआ मल (Dirty matter)—जो कि जहरीला होने से सैल्सों को हानि पहुँचाने वाला है—उनके पास इकट्ठा न होने दिया जाय। (२) सैल्स के जीवित होते हुए भी उनके सब कार्यों को रोक दिया जाय जिससे उन्हें खुराक की आवश्यकता न रहे।

प्रो० केरल के यह दोनों उपाय और उनके विचार पाश्चात्यों के लिए चाहे कितने भी नवीन और खोजपूर्ण हों किन्तु प्रतिदिन सन्ध्या प्राणायाम परायण भारतीय के लिए इनका महत्व बिलकुल नहीं के बराबर है। इन विचारों में वही तथ्य प्रतिपादन किया गया है जिसे लाखों वर्ष पूर्व भारतीय महर्षियों ने न केवल संसार के समक्ष रक्खा, अपितु प्रत्यक्ष करके दिखाया। इसी प्राणायाम के ऊँचे अभ्यास से वे लोग अपने शरीर के सैल्स के ऐसे सब कार्यों को बन्द कर देते थे और घण्टों, दिनों, महीनों और वर्षों समाधि लगाकर ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देते थे कि उनके सैल्स को किसी प्रकार की खुराक की आवश्यकता न होती थी।

प्रो० केरल का यह कथन बिलकुल ठीक है, कि मनुष्य-शरीर के कार्यों को शताब्दियों तक रोकने के बाद फिर चलाया जा सकता है। इस तरह जितने समय तक पुरुष निश्चेष्ट रहेगा उतने समय की गणना उसकी शारीरिक आयु के साथ न होगी; क्योंकि उसके लिए तो समझ लीजिए, जीवन क्या संसार की प्रत्येक वस्तु—यहाँ तक कि समय भी ठहर गया। २५ वर्ष का युवक यदि सौ वर्ष की समाधि में बैठे तो उठने के बाद उसके शारीरिक अंग प्रत्यंग २५ वर्ष के युवक के ही होंगे। उसने यदि संसार में १०० वर्ष जीना है तो समाधि से उठने के बाद वह ७५ वर्ष और जीयेगा। इस बात को आप साधारण से दृष्टान्त से अच्छी तरह समझ सकते हैं। घड़ियों के कारखाने में घड़ी के तैयार हो जाने के उपरान्त कारखाने वाले उसकी चलने की अवधि या गारन्टी का निर्धारण करते हैं। मान लीजिए एक घड़ी सन् ५० में बनी है और दश वर्ष की उसकी गारंटी की गई है। हम सन् ६१ में उसे खरीदते हैं, तो क्या हम समझ लें कि उस घड़ी की उम्र जो दश वर्ष की नियत की गई थी—समाप्त हो चुकी है और अब वह काम न देगी। ऐसा नहीं है, उसका जीवन तो सन् ६१ से आरम्भ हुआ समझिये। दो साल चलाकर यदि बीच में आप उसे तीन वर्ष के लिए बन्द करदें तो फिर चलाने पर वह ८ वर्ष और काम देगी। यही बात समाधिस्थ शरीर पर भी लागू होती है।

सारांश यह है कि आज के वैज्ञानिकों के पास भी प्राणायाम ही एक ऐसा हल है जिससे वे मनुष्य को अमर बना देने की समस्या को सुलझाने में संलग्न हैं। यह भारतीयों का दुर्भाग्य ही है कि विदेशी वैज्ञानिक जिन विचारों तथा सिद्धांतों का पता बड़ी खोज के बाद लगाते हैं, वे उन्हें ऋषि परम्परा से विरासत में मिले हैं किन्तु वे उनसे लाभ नहीं उठा पाते।

(५) प्राणायाम की पूर्णता—

प्राणायाम के सम्बन्ध में इस अन्तिम अनुच्छेद को लिखे बिना न केवल विषय ही अधूरा रहेगा, बल्कि ऐसा करना उन जिज्ञासु पाठकों के प्रति अन्याय भी होगा जो इस ग्रन्थ से प्रेरणा प्राप्त कर प्राणायाम के अभ्यास में तत्पर हों और इन अवश्यज्ञातव्य बातों के अभाव में उसके पूरे लाभ से वञ्चित रह जायं। अस्तु, यों तो शास्त्रकारों ने प्राणायाम के—

सहितः सूर्यभेदश्च उज्जायी शीतली तथा।
भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा केवली चाष्टकुम्भकाः॥

—सहित, सूर्यभेदी, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्च्छा और केवली—यह आठ प्रकार बतलाए हैं जो अमुक अमुक दशा को प्राप्त हुये अधिकारियों के लिए लाभप्रद होते हैं, परन्तु इनमें सर्व प्रथम भेद 'सहित', अथवा—अनुलोम विलोम क्रम—ही सर्व साधारण के लिए उपयुक्त होता है। सभी प्राणायाम तीन विधियों में सम्पन्न होते हैं—पूरक, कुम्भक, रेचक। पूरक का अर्थ है श्वास का आकर्षण, कुम्भक=श्वास वायु का धारण और रेचक का तात्पर्य है उस रुकी वायु का निःसरण। यह तीनों क्रियाएँ विधिवत् की जानी चाहिएँ।

प्राणायाम प्रारम्भ करने से पूर्व पांव की एड़ी को गुदा के समीप सीवन पर लगा लेना चाहिये। इससे गुदनलिका का आकुञ्चन होकर अपानवायु ऊर्ध्वगामी बन जायगा और प्राणों के शोधन में बड़ी सरलता पड़ेगी। अब पहिले चन्द्र स्वर अर्थात् नाक के बायें छिद्र से धीरे-धीरे वायु को ऊपर खेंचिये। साधारण अवस्था में वायु के खेंचने में १६ मात्रा=लगभग ८ सैकिंड का समय लगाना चाहिए। यथा—

इडयाकर्षयेद्वायुं बाह्यं षोडशमात्रया। (देवी गीता)

अर्थात्—सोलह बार ॐकार या अन्य किसी स्वर का उच्चारण करने में जितना समय लगता है उतने समय में वायु को खेंचना चाहिये।

जब पूर्णरूप से वायु आकर्षित हो जाय तब उसका निरोध करना चाहिये। इसे कुम्भक विधि कहा जाता है। यह निरोध क्रिया करते हुए कण्ठ की नली को पीछे की ओर सिकुड़ाकर ठोडी को हृदय पर स्थापित कीजिए। इस क्रिया से फेफड़ों में निरुद्ध वायु में चञ्चलता न आ सकेगी और संग्रहीत वायु से उत्पन्न प्राणशक्ति का अपव्यय न होगा। वायु का यह निरोध सामान्यतया ६४ मात्रा काल=अन्यून ३० सेकिण्ड तक होना चाहिए। यथा—

धारयेत्पूरितं योगी चतुष्षष्ट्या तु मात्रया।

अर्थात्—चौसठ बार किसी वर्ण के उच्चारण समय तक वायु को धारण करना चाहिए।

उपरोक्त काल तक अथवा यथाशक्ति वायु का निरोध करने के अनन्तर रेचक प्रारम्भ होता है। इसमें सूर्य स्वर अर्थात् नाक के दायें छिद्र से वायु को धीरे-धीरे निकालिये। रेचक क्रिया के समय पेट तथा पेड़ू को पीठ की ओर आकर्षित कीजिए; इससे वायु पूरित फेफड़ों को नीचे आधार मिल जाता है। वायु के आघात से उन्हें किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचती और रेचन क्रिया सुगमता से हो जाती है। रेचन क्रिया बिलकुल धीरे-धीरे हो और उसमें पूरक की अपेक्षा दुगना=अन्यून १६ सेकिन्ड समय तो लगना ही चाहिए। यथा—

———द्वात्रिंशन्मात्रया शनैः।
नाड्या पिंगलया चैवारेचयेद्योगवित्तमः॥

प्राणायाम की पूरकादि तीनों विधियों के साथ उपरोक्त क्रियाओं का गहन सम्बन्ध है। इन पर यथेष्ट ध्यान न देने से प्राणायाम तो अपूर्ण रहेगा ही, किन्तु उससे हानि भी सम्भव है। योगशास्त्रों में इन क्रियाओं को क्रमशः मूलबन्ध, जलन्धर बन्ध और उड्डियान बन्ध के नाम से स्मरण किया गया है एवं प्राणायाम की पूर्णता के लिए इन्हें आवश्यक माना है।