सन्ध्या का उपसंहारात्मक अन्तिम अनुष्ठान सूर्योपस्थान है। साधक सूर्याभिमुख खड़े होकर सूर्य भगवान् को जल की तीन अंजलि प्रदान करता है और दोनों हाथ उत्तान रूप में फैलाकर सविता देव की स्तुति करता है। वेद में लिखा है कि—
अथ सन्ध्यायां यदपः प्रयुङ्क्ते ता विप्रुषो वज्रीभूत्वा असुरानपाघ्नन्ति
(षड्विंश ४।५)
अर्थात्—सन्ध्या में जो जल का प्रयोग किया जाता है, वे जलकण वज्र बनकर असुरों का विनाश करते हैं।
इस बुद्धिवाद के युग में सूर्यकिरणों द्वारा असुर नामक किसी जाति विशेष के प्राणियों का, अथवा आध्यात्मिक रूप में बाह्य वातावरण में फैले हुये असुरों, तथा हृदय में आसुरीभावरूप असुरों का विनाश, आप चाहे मानें या न मानें, किन्तु मानवजाति के लिए असुरों से भी अधिक अहितकारी प्रस्तुत चित्र में प्रदर्शित—टाइफाइड राजयक्ष्मा फिरंग निमोनिया के जीवाणुरूप असुरों के विनाश के लिये सूर्य किरणों की दिव्य सामर्थ्य तो बाध्य होकर माननी ही पड़ेगी। आप यह जानकर आश्चर्यचकित होंगे कि इनमें से कतिपय जीवाणुओं के लिए सूर्य-प्रकाश सी अमोघ और अव्यर्थ महौषधि कोई है ही नहीं। इसका निदर्शन डा० मुकुन्दस्वरूप वर्मा B.S.C., M.B.B.S. चीफ मैडिकल आफिसर काशी विद्यालय के शब्दों में सुनिये। डा० साहिब अपने 'संक्षिप्त शल्य विज्ञान' में लिखते हैं—
"सूर्यप्रकाश का जीवाणुओं पर बहुत प्रभाव पड़ता है। एन्थ्रेक्स के स्पोर जो कई वर्षों के शुष्कीकरण से नहीं मरते सूर्य प्रकाश से डेढ़ घण्टे में मर जाते हैं। आन्त्रिक ज्वर (टायफायड) के जीवाणु भी डेढ़ घण्टे तक सूर्य प्रकाश में रहने से नष्ट हो जाते हैं, किन्तु इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक जीवाणु पर किरणें पड़ें। राजयक्ष्मा के जीवाणु का भी यही हाल है। सूर्य प्रकाश उसका सबसे बड़ा बैरी है। प्रयोगों से मालूम हुआ है कि सूर्य-प्रकाश के हरे बैंगनी और अल्ट्रावायलेट भाग में जीवाणुओं के नाश करने की विशेष शक्ति है"। अस्तु,
जो नास्तिक लोग कल तक इस विज्ञानपूर्ण वैदिक विधान को कोरी पोपलीला कहकर मखौल उड़ाया करते थे, स्वास्थ्य-विज्ञान की नई खोज ने कान पकड़कर आज उन्हीं लोगों को नामान्तर और रूपान्तर में यही क्रिया करने के लिए बाध्य कर दिया है। पाश्चात्य जगत् और उसका अन्धानुकरण करने वाले भारतीय अब अनेक शारीरिक रोगों के लिए 'सन बाथ' (Sun Bath) अर्थात् खुले बदन सूर्य किरणों में स्नान करने लगे हैं। अमेरिका में तो गर्मी-सर्दी सहन करने के लिए सदैव दिगम्बर रहने वाला एक सम्प्रदाय-सा ही चल पड़ा है, जिसके अनुयायी सहस्रों प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने देश के कानून को तोड़ कर—नाना प्रकार का दण्ड भुगतते हुए भी अपनी टेक को नहीं छोड़ते।
अमुक रंग की बोतल में केवल फिल्टर किया पानी भरकर सूर्य की खुली धूप में रख देना, फिर नियत समय के बाद उस जल को ही अमुक-अमुक रोग में रंग के तारतम्य के अनुसार बीमार को औषध रूप में पिलाना आजकल एक यह भी नई चिकित्सा-प्रणाली निकली है, विश्वास किया जाता है कि सूर्य किरणों से संस्पृष्ट यह जल बोतल के काँच के रंग की विशेषता के अनुसार अमुक-अमुक रोगों को दूर करने में अमोघ औषध सिद्ध होता है।
हम सिद्धान्ताध्याय के प्रत्यक्ष परोक्षवाद प्रघट्ट में यह सिद्ध कर चुके हैं कि वैदिक विज्ञान के अनुसार समस्त रंगों का मूल स्रोत एकमात्र सूर्य की किरणें ही हैं,—सो यदि हम सूर्योपस्थान विधान के प्रकाश में वर्तमान समय के उपर्युक्त सूर्य किरण स्नान (Chrowopathy) और सौर जलाभिमर्षण का विश्लेषणात्मक अध्ययन करें, तो यह विदित हो जाएगा कि आज का पाश्चात्य-जगत् अपने जिन उपर्युक्त आविष्कारों को अभूतपूर्व और बेजोड़ समझकर फूला नहीं समाता वस्तुतः वे दोनों आविष्कार हमारे अनन्त सहस्राब्दियों से चले आने वाले नित्य कर्म्म=सूर्योपस्थान की छाया मात्र हैं। इन दोनों में यदि कोई अन्तर है तो केवल यही है कि जहाँ सूर्योपस्थान असुरभूत, अनेक शारीरिक रोगों के दूर करने का वज्र के समान अव्यर्थ साधन होते हुए अदृष्टफल—पुण्याधायक धार्मिक अनुष्ठान भी है वहाँ सूर्य-किरण-स्नान और सौरजलाभिमर्षण चिकित्सा-पद्धतियें अपूर्ण, एकदेशी एवं 'अन्धेरे में चांद मारी' के बराबर हैं।
सूर्यार्घ्य में साधक, जलपूरित अञ्जलि लेकर—सूर्याभिमुख खड़ा होकर जब जल को भूमि पर गिराता है तो नवोदित सूर्य की सीधी पड़ती हुई—किरणों से अनुविद्ध वह जलराशि, मस्तक से लेकर पाँव पर्यन्त साधक के शरीर के समान सूत्र में गिरती हुई, सूर्य किरणों से उपात्त रंगों के प्रभाव को ऊपर से नीचे तक समस्त शरीर में प्रवाहित कर देती है। इसलिये वेद शास्त्रानुसार प्रातः पूर्वाभिमुख, उगते हुए सूर्य के सामने और सायं पश्चिमाभिमुख छुपते हुए सूर्य के सामने खड़े होकर सूर्य्यार्घ्य देने का विधान है।
सूर्योपस्थान में सूर्यस्नानचिकित्सा विधि की तरह, तीनों समय सूर्य की ओर लम्बे हाथ फैलाकर साधक अंगुलियों के अग्र भाग में वैद्युत चुम्बक स्विचों की भाँति प्रकृति देवी द्वारा निहित नखों की मार्फत सप्तविध रंगों से परिपूरित सौर प्रवाह को अपने शरीर में धारण करता है। इसीलिये शास्त्र में सन्ध्या का विधान है, आर्यसमाज प्रवर्तक स्वामी दयानन्द जी की निर्मूल आशङ्का के अनुसार आधी रात के समय सूर्य सामने न होने के कारण चौथी सन्ध्या की कल्पना व्यर्थ है।
कहना न होगा हमारे इस वैदिक अनुष्ठान में आधुनिक सूर्य किरण-स्नान और सौर-जलाभिमर्षण क्रियाओं के समस्त लाभ तो आ जाते हैं परन्तु असमय में ललाटतप सूर्य की धूप सेकने से और बोतलों में बन्द—कई दिन तक रक्खे हुये विकृत पानी के पीने से होने वाली अपने अप्रत्याशित हानियों का खतरा नहीं होता—यही सूर्योपस्थान के संक्षिप्त लाभों का दिग्दर्शन है।