शास्त्र में लिखा है कि—
विना दर्भैश्च यत्कृत्यं यच्च दानं विनोदकम्।
असङ्ख्यया तु यज्जप्तं तत्सर्वं निष्फलं भवेत्॥
(अङ्गिरा स्मृति)
अर्थात्—बिना कुशा के जो तत्तद् धर्मानुष्ठान, और बिना जल संस्पर्श के जो दान, तथा बिना माला से संख्याहीन जो जप, वे सब निष्फल होते हैं। नामधारी सिक्ख ऊनकी ग्रन्थिल माला, निहंग सिक्ख लोहे की माला तथा मुसलमान ईसाई भी 'तसबी' रखते हैं। यह क्यों ?—इसलिये कि (१) प्रथम तो माला के फेरने से कितना जप हुआ इस बात का ठीक पता चल जाता है और अपने-अपने निश्चित नियम के अनुसार पुरुष अपने समय का नियन्त्रण कर सकता है। (२) दूसरे—माला भी प्रायः 'शुचि' संज्ञक वस्तुओं से ही बनाई जाती है। अतः कुशा की भांति इससे भी वही सब लाभ होंगे। (३) तीसरे-अंगुष्ठ और अंगुली के संघर्ष से एक विलक्षण विद्युत् उत्पन्न होगी, जो धमनी के तार द्वारा सीधी हृदय चक्र को प्रभावित करेगी, इधर-उधर डोलता हुआ मन इससे निश्चल हो जाएगा।