प्रधान धर्माचार्यों और जगद्गुरुओं को श्री १०८ लिखने की प्रचलित परिपाटी का हेतु भी स्पष्ट है। हमारे इस ब्रह्माण्ड में समस्त ग्रह पिण्डों से ऊपर नक्षत्र कक्षा कही जाती है। नक्षत्र से ऊपर अन्य कोई पिण्ड नहीं—सो हम जिस व्यक्ति को सर्वोच्चपद प्रदान करना चाहें उसे नक्षत्र कक्षा से ही उपमित कर सकते हैं, यह पदवी प्रायः परिव्राजक अर्थात्—निरन्तर सर्वत्र घूम-घूम कर धर्म प्रचार करने वाले महात्माओं के साथ ही प्रयुक्त की जाती है। अतः यहां भी नक्षत्र संख्या और दिग् संख्या को गुणित करके २७×४=१०८ लिखा जाता है। आजकल जो श्री एक हजार एक सौ आठ और अनन्त श्री लिखने का प्रचार हो चला है यह जहां सौ से अधिक सहस्र और सहस्र से अधिक लक्ष इस प्रकार उत्तरोत्तर बढ़ते हुये 'अनवस्था' दोष से ग्रस्त होने के कारण अन्त में निरर्थक सिद्ध होता है वहाँ 'होली' से बड़ा 'होला' तो 'दीवाली' से बड़ा 'दीवाला' का भी प्रत्यक्ष निदर्शन है।