नियमित दिनचर्या क्यों ?

नियमित दिनचर्या क्यों ?

हमारी दिनचर्या नियमित है। प्रातः जागरण से लेकर शयन तक की समस्त क्रियाओं के लिए शास्त्रकारों ने अपने दीर्घकालीन अनुभव से ऐसे नियमों का निर्माण किया है जिनका अनुसरण करके मनुष्य अपने जीवन को सफल कर सकता...

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यथा विधि करने से क्या लाभ ?

यथा विधि करने से क्या लाभ ?

यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि अमुक पुरुष विष खाने से मर गया और कदाचित् उपचार करने पर, न भी मरा तब भी शास्त्र-दृष्टि से वह पापी है और अदालत में भी आत्महत्या करने के उद्योग के अपराध में उसे उचित दण्ड दिय...

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क्या विधि-विधान व्यर्थ ढकोसला है ?

रोटी के खाने से पेट भरता है यही रोटी खाने का उद्देश्य है, फिर उसमें—'यूँ खाओ, यूँ न खाओ' का अड़ङ्गा लगाना व्यर्थ है। क्या तथाकथित विधि के अनुसार खाने से डबल पेट भर जाता है ? इसीप्रकार अन्यान्य बातों म...

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प्रातः जागरण

हमारी दैनिक चर्या का आरम्भ प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से होता है। शास्त्रों की आज्ञा है—ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत।अर्थात्—प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिये। ब्रह्म मुहूर्त की व्याख्या करते...

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प्रातः जागरण क्यों ?

यद्यपि उपरोक्त प्रश्न का वास्तविक उत्तर तो इसका आचरण करने पर ही मिल सकता है, क्योंकि किसी भी शंका का समाधान उसके उत्तर में प्रतिपादित तथ्यों की अनुभूति से ही सम्भव है, तथापि इतना जान लेना चाहिये कि यह...

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प्रातः स्मरण

(ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थं चानुचिन्तयेत्—मनु)धर्मशास्त्रों ने निद्रा त्याग के उपरान्त मनुष्य-मात्र का प्रथम कर्तव्य उस कोटि २ ब्रह्माण्ड-नायक, सच्चिदानन्द-स्वरूप प्यारे प्रभु का स्मरण करना ब...

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प्रातःस्मरणीय शिष्टाञ्जलि और उसका महत्व

भगवत्स्मरण सम्बन्धी कतिपय पद्यों के अतिरिक्त हिन्दुओं के दैनिक पाठ में शिष्टाञ्जलि नामक कुछ पद्यों का सन्निवेश और होता है जिसको कि प्रतिदिन प्रातःकाल नियमपूर्वक पढ़ा जाता है। इस अञ्जलि का अपना विशेष म...

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कर दर्शन

कर दर्शन

भगवत्स्मरणानन्तर शास्त्रीय विधान, कर दर्शन का है।कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥अर्थात्—हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का निवास है, हाथ के मध्य भाग में सरस्वती र...

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भारत माता की वन्दना

मातृ-भूमि वन्दना भी प्रातःकालीन कृत्यों में से आवश्यक कृत्य है। कर दर्शन के अनन्तर शास्त्रकारों ने मातृ-वन्दना का विधान किया है। निम्नलिखित प्रार्थना के साथ पृथ्वी को स्पर्श करते हुए यह वन्दना की जाती...

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भारतमाता के आधुनिक पुजारियों से दो-दो बातें

उपर्युक्त श्लोक में कितने सरल और संक्षिप्त शब्दों में रूपक द्वारा मातृ-भूमि का चित्र प्रस्तुत किया गया है—यह सहज ही जाना जा सकता है। कुछ लोगों का विचार है कि देश-प्रेम तथा मातृ-भूमि-प्रेम आदि भावनायें...

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राष्ट्रीय चेतना का मूल मंत्र

इस पद्य में मातृभूमि के उन सब गुणों का—जो कि एक माता में होने चाहिये—वर्णन बड़े ही सुन्दर ढंग से किया गया है। ३२ अक्षर के छोटे से अनुष्टुब् वृत्त में इतनी सरलता से इतने गम्भीर अर्थों का समावेश ही इस व...

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प्रातः दर्शनीय पदार्थ

शय्या परित्याग के बाद शौच स्नानादि नित्य कृत्य करने चाहिये। इस विषय में प्रसंगवश यह भी लिख देना उचित होगा कि प्रातःकाल सर्वप्रथम जिन पदार्थों पर हमारी दृष्टि पड़े वे ऐसे न होने चाहिये कि उनको देखने से...

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मल विसर्जन

कहा जा सकता है कि बिना इस पुस्तक को पढ़े भी मनुष्य प्रतिदिन मलत्याग करते ही हैं, और—मनुष्यों की बात छोड़ दीजिए, पशु-पक्षी भी बिना किसी रुकावट के इस प्राकृतिक आवश्यकता को पूरा कर लेते हैं फिर ऐसे घिनौन...

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बोले क्यों नहीं

शौच लघुशंका आदि के समय मौन, एक सनातनी प्रथा मात्र नहीं किन्तु धर्मशास्त्रानुमोदित एवं विज्ञान समर्थित शिष्टाचार है। प्रायः अशिक्षित, या उच्चशिक्षित होते हुए भी भारतीय संस्कारों से शून्य व्यक्तियों में...

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पशुता की ओर

पशुता की ओर

तिष्ठन् न मूत्रपुरीषे कुर्यात् (पारस्कर गृह्य सूत्र)अर्थात्—खड़े २ मूत्र पुरीषोत्सर्ग न करे।डर्विन साहब की पशु से मनुष्य बन जाने की विकासवाद की थ्यूरी में अगर कोई सचाई हो सकती है तो वह यही की आज भी मन...

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